चर्चा में

कलेक्टर साब! आपदा और लाकडाउन पीरियड में शुल्क माफी तो बच्चों का अधिकार है…?

■ लाकडाउन ने अभिभावकों की कमर तोड़ दी है…
@ अरविंद सिंह
■ जी हां कलेक्टर साब! कोरोना महामारी ने दुनिया को अंदर और बाहर से हिला कर रखा दिया है. उससे उपजी समस्याएं और लाकडाउन ने मध्यवर्ग की जमापूंजी खत्म कर दी है. रोजगार और आय के साधनों पर लगातार मार्च से अब तक तालाबंदी ने इस समाज की आर्थिक रीढ़ भी तोड़ कर रख दी है. और उसे संभलने में वर्षों लग सकते हैं.
ऐसे में लाकडाउन के कालखंड (अप्रैल, मई और जून) में बच्चों से शुल्क की मांग करने वाले स्कूल प्रबंधन और उनके समर्थन में आप के फ़रमान पर दोनों को ही उदारता पूर्वक फिर से विचार करना चाहिए.
सच तो यह है कि किसी भी सामूहिक हित और अहित से जुड़े मुद्दे पर फैसला लेने से पहले समाज की आर्थिक और मानसिक परिस्थितियों को भी समझना चाहिए. उसकी सूरत और सीरत के साथ गरीब और मध्य वर्ग की आर्थिक स्थिति की जानकारी और अध्ययन भी जिलाधिकारी जैसी संस्था को इस तरह के आदेश से पहले करनी चाहिए. वैसे भी इस पीरियड में विद्यालय भी लाकडाउन ही थे. और संस्थाओं ने विगत सालों में इतने जरूर कमाएं हैं कि अपने कर्मचारियों को तीन माह की तनख़्वाह उदारता से दे ही सकते हैं. अपनी हर प्रकार की शुल्क वसूली, किताबों और कापियों के साथ-साथ यूनीफॉर्म तक अपनी ही दुकानों से बिक्री में, इतना धनराशि तो जरूर एकत्रित हुएं हैं कि अपने स्टाफ को तीन महीने सहयोग कर सकें.
इस तरह के आदेश कहीं तुगलकी फ़रमान की श्रेणी में न हो जाएं, इसका भी ख़्याल करना चाहिए. जब नोएडा जैसे आधुनिक जीवन शैली और आर्थिक रूप से सक्षम जिले में इन तीन महिनों की शुल्क वसूली करने पर एक युवा जिलाधिकारी ने पाबंदी लगा दी है तो आजमगढ़ जैसे पिछडे़ और आर्थिक रूप से कमजोर जनपद में इन महिनों की शुल्क वसूली का आदेश कैसे दिया जा सकता है.इस संबंध में योगीराज को भी ढुल मूल नीति को त्याग कर, स्पष्ट आदेश करना चाहिए. वह अपने नागरिकों पर इस आपदा काल में इस तरह के अतिरिक्त बोझ कैसे डाल सकती है.और ऐसे समय में उसकी चुप्पी आम आदमी के ऊपर कहीं सांघतिक असर न डाले, इसका भी ख्याल करना चाहिए.
आधुनिक विद्या के मंदिरों के मालवीयों! बीएचयू के निर्माण के लिए मालवीय जी ने भीख तक मांगी है, लोगों से सहयोग लिए हैं.तब जाकर बीएचयू जैसी महान संस्था खड़ी हुई, उन्होंने शिक्षा को व्यापार और बाजार नहीं बनाया, बल्कि सेवा की मूल भावना से जोड़ा और समाज की आत्मा की दर्द और पीड़ा को आत्मसात कर लोगों की मदद की. यह सच है कि आप मालवीय नहीं बन सकते, लेकिन शिक्षा के व्यापारी तो मत बन जाओ! गली-मोहल्ले का वह चालक वणिक तो मत बन जाओ, जो हर हाल में अपना ही लाभ देखने की प्रवृत्ति से अभिशप्त होता है.सब कुछ तो नहीं लेकिन,उस महामना के गुणों और आदर्शो का पासंग तो अपने चरित्र में आत्मसात करो. पैसे के मखमली सेज पर सोने पर भी निंद्रा नहीं आएगी, जबतक गरीब की हया और उसकी लाचारी की बद्दुआएं बटोरते रहेंगे. शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा है उसे व्यापार उतना ही बनाओं, जिससे उसकी आत्मा न मरे.

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