शब्द मसीहा : बेटियाँ जन्नत से आती हैं
अर्चना कई दिनों से जिद कर रही थी कि उसकी मेडम ने कहा है कि हर बच्चे के बस्ते में मेडिकल किट होनी चाहिए और उन्हें जरूरतमंद की मदद करनी चाहिए . आज सीमा ने अपनी दवाओं के साथ मेडिकल किट का सामान भी खरीद लिया .
“अर्चना ! बेटी अपने खाने के साथ मेडिकल किट भी रख लेना बस्ते में !” सीमा ने रसोई से पुकारा .
अर्चना बहुत खुश थी आज . उसने सहेजकर खाने का टिफिन और मेडिकल किट रख लिया और अपने स्कूल की बस पकड़ने को बाहर निकल पड़ी . आज अर्चना को लग रहा था कि वह भी दूसरे बच्चों के समान भाग्यशाली हो गयी है . अब उसके हाथ में भी भलाई का अवसर और औजार है . बस आने पर वह उसमें बैठ स्कूल चली गयी .
दोपहर तीन बजे वापसी में उसे बस ने छोड़ा . वह घर की ओर चल पड़ी . सूरज तप रहा था . उसका मासूम गोरा चेहरा गर्मी से लाल हुआ पड़ा था . जब पार्क के बगल से वह गुजर रही थी तो उसने किसी के कराहने की आवाह सुनी . अर्चना ने इधर-उधर देखा मगर कोई नहीं दिखा . तब उसने प्रवेश द्वार के अन्दर झाँका तो एक व्यक्ति पड़ा हुआ था . जिसके कपडे बहुत ही गंदे थे और पैरों पर घाव थे . बाल बुरी तरह उलझे और बेतरतीब बढे हुए थे .
अर्चना को अपनी मेडम की बात याद आ गयी कि जहाँ भी मौका मिले दूसरों की मदद करो . इस से भगवान् खुश होता है . अर्चना ने अपने पीठ पर लादे हुए बैग को जमीन पर रखा और उस व्यक्ति के पास बैठ गयी . उसने बिना डरे उसके घावों को साफ़ कर उन पर दवा लगाईं . रुई का फाहा रखा और अपने कोमल हाथों से उसपर पट्टी कर दी .
“कुछ खाओगे ?” उसने पूछा .
“हाँ .” जैसे उस मुर्दे में कोई जान आ गयी थी . अर्चना ने उसके हाथ धुलाये और अपने टिफिन के दो बचे हुए परांठे उसके हाथ पर रख दिए .
वह व्यक्ति खाने और अर्चना को देख जोर-जोर से रोने लगा .
“क्या हुआ ? दुःख हो रहा है !” अर्चना बोली .
“नहीं .”
“तो फिर रो क्यों रहे हो ?” अर्चना ने पूछा .
“तुम्हारे जैसी मेरी भी बेटी थी . मैंने उसे मार दिया था . अगर जिन्दा होती तो बाईस साल की होती . मैं भी खुश होता . ये मेरी सजा है . मेरी नौकरी चली गयी . पत्नी घर छोड़ गयी और भाइयों ने मेरे घर पर कब्ज़ा कर लिया . फिर मैं बीमार हो गया और अब ऐसे ही कहीं भी पड़ा रहता हूँ . आज तुम्हे देखा तो मेरे पाप मेरे सामने आ खड़े हुए .” वह रोते हुए बोला .
“रोना बंद करो ! इत्ते बड़े आदमी रोते नहीं हैं . तुम एक और बेटी ले आओ . उसका अच्छे से ख्याल रखना . मेरी मेडम कहती हैं कि बेटियाँ जन्नत से आती हैं उनका हमें ख्याल रखना चाहिए .” अर्चना मुस्कुराते हुए अपना बैग पीठ पर लादे हुए चल पड़ी .
इस मुस्कराहट से भयानक पीड़ा कभी उस आदमी को पहले नहीं हुई थी . उसकी चीत्कार एक बार फिर गूँज उठी हवाओं में .
(लेखक – केदारनाथ शब्द मसीहा दिल्ली रेलवे विभाग में इंजीनियर हैं)

