अपना भारत

“किसान दिवस: भाषणों से आगे खेतों की हकीकत”

हाथों में हल, आंखों में उम्मीद है,
ये कोई और नहीं
असली भारत की तस्वीर है
पैरों में जिसके मिट्टी, हाथों में छाले हैं,
ये कोई और नहीं
अन्नदाता हैं हमारे…

@ अनुपम श्रीवास्तव…

गोरखपुर। भारत को दुनिया गर्व से कृषि प्रधान देश कहती है। देश की आधी से अधिक आबादी आज भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से खेती पर निर्भर है। खेतों में उगाया गया अन्न न केवल देश का पेट भरता है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी भी वही है। लेकिन किसान दिवस पर यह सवाल सबसे ज़्यादा चुभता है कि क्या इस कृषि प्रधान देश में किसान सचमुच सुरक्षित, सम्मानित और सुना हुआ है?
किसान दिवस हर साल मनाया जाता है, भाषण होते हैं, आंकड़े गिनाए जाते हैं, योजनाओं की सूची पेश की जाती है, लेकिन खेतों की हकीकत इन दावों से मेल नहीं खाती।

आज का किसान मौसम की बेरुख़ी से सबसे पहले टकराता है। कभी असमय बारिश, कभी सूखा, कभी बाढ़—जलवायु परिवर्तन ने खेती को जोखिम का व्यवसाय बना दिया है। लागत लगातार बढ़ रही है—बीज, खाद, कीटनाशक, डीज़ल और बिजली—लेकिन फसल का मूल्य किसान के हाथ में नहीं है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) हर साल घोषित होता है, पर अधिकांश किसानों के लिए यह केवल कागज़ी भरोसा बनकर रह गया है। खुले बाजार में किसान अपनी उपज औने-पौने दामों पर बेचने को मजबूर है। बिचौलियों का दबदबा, भंडारण की कमी और परिवहन की दुश्वारियाँ किसान की मेहनत का मुनाफा निगल जाती हैं।
कर्ज़ किसानों की सबसे बड़ी त्रासदी बन चुका है। बैंकिंग प्रक्रिया जटिल है, राहत योजनाएँ समय पर नहीं पहुँचतीं और फसल बीमा अक्सर नाममात्र का सहारा साबित होता है। फसल बर्बाद होने के बाद किसान मुआवज़े की फाइलें लेकर दफ्तरों के चक्कर काटता है, जबकि साहूकार तुरंत दरवाज़ा खोल देता है—भले ही उसकी कीमत किसान को भारी चुकानी पड़े।

इन सबके बीच सरकार और किसानों के रिश्ते पर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं। किसान जब अपनी बात रखने सड़क पर उतरता है, तो उसे संवाद नहीं, संदेह की नज़र से देखा जाता है। बैरिकेड, लाठियाँ और मुकदमे—यह व्यवहार उस अन्नदाता के साथ होता है, जिसे देश की रीढ़ कहा जाता है। योजनाओं और घोषणाओं की भाषा और खेत की ज़मीनी सच्चाई के बीच की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है।

डिजिटल खेती, ड्रोन और आधुनिक तकनीक की बातें ज़रूर हो रही हैं, लेकिन छोटे और सीमांत किसान के लिए आज भी सिंचाई, बिजली और बाजार सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं। जब तक नीति खेत तक नहीं पहुँचेगी, तब तक विकास के दावे अधूरे ही रहेंगे।

किसान दिवस केवल शुभकामनाओं का दिन नहीं, आत्ममंथन का दिन होना चाहिए। MSP की कानूनी गारंटी, लागत आधारित मूल्य निर्धारण, समयबद्ध फसल बीमा भुगतान, सस्ती और सरल ऋण व्यवस्था तथा सरकार–किसान के बीच स्थायी संवाद—ये आज की सबसे बड़ी जरूरत हैं।

अन्नदाता को सम्मान भाषणों से नहीं, भरोसे और न्यायपूर्ण नीतियों से मिलता है। किसान मजबूत होगा, तभी गांव मजबूत होंगे और तभी भारत सच में गर्व के साथ कृषि प्रधान देश कहलाएगा। किसान दिवस का असली अर्थ यही है—किसान को सुना जाए, समझा जाए और उसके साथ खड़ा रहा जाए।

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