भारत-पाकिस्तान युद्धविराम की घोषणा-कितना उचित कितना अनुचित
@ डॉ. निशा नंदिनी गुप्ता…
तिनसुकिया, असम
भारत india और पाकिस्तान Pakistan के मध्य संबंधों का इतिहास संघर्ष,युद्ध और अस्थिरताओं से भरा हुआ है। समय-समय पर दोनों देशों के बीच युद्धविराम की घोषणाएँ हुई हैं। इन घोषणाओं के पीछे कभी राजनीतिक रणनीति रही है तो कभी मानवीय दृष्टिकोण। किंतु हर बार एक प्रश्न अनिवार्य रूप से उठता है…क्या यह युद्धविराम उचित है? या यह किसी गहरे खतरे की एक मात्र अनदेखी ?
उचित के पक्ष में तर्क
मानव जीवन की रक्षा—
युद्ध के दौरान न केवल सैनिकों, बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले निर्दोष नागरिकों की जान जाती है। युद्धविराम उनकी रक्षा का उपाय बनता है।
सांस्कृतिक और सामाजिक संबंधों को बनाए रखना–
दोनों देशों की साझी सांस्कृतिक विरासत,भाषाई समानताएँ और पारिवारिक रिश्ते शांति की मांग करते हैं। युद्धविराम से संवाद और सह-अस्तित्व की संभावना बनती है।
आर्थिक बोझ से मुक्ति—
युद्ध की कीमत चुकाने में दोनों देशों की अर्थव्यवस्था डगमगा जाती है। युद्धविराम से संसाधनों का रचनात्मक उपयोग संभव होता है।

अंतरराष्ट्रीय छवि—
वैश्विक मंच पर शांतिप्रिय राष्ट्र के रूप में पहचान बनाना आज हर देश की प्राथमिकता है। भारत द्वारा युद्धविराम की घोषणा उसी दृष्टिकोण की परिचायक है।
अनुचित के पक्ष में तर्क
पाकिस्तान की अविश्वसनीयता—
पाकिस्तान द्वारा पहले किए गए कई युद्धविराम समझौतों का उल्लंघन इसका प्रमाण हैं। ऐसे में बार-बार युद्धविराम की पहल भारत की रणनीतिक दृढ़ता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
आतंकवाद को आश्रय— पाकिस्तान प्रायः युद्धविराम का उपयोग आतंकी गुटों को फिर से संगठित करने और भारत के विरुद्ध गतिविधियों को बढ़ाने के लिए करता है।
सैनिकों के मनोबल पर प्रभाव—
जब भारत अपनी ओर से शांति का हाथ बढ़ाता है,जबकि दूसरी ओर से लगातार उकसावे होते हैं, तो इससे हमारे सैनिकों का मनोबल प्रभावित हो सकता है।
राष्ट्रहित की अनदेखी—
यदि युद्धविराम रणनीतिक रूप से सोच-समझकर न किया जाए, तो यह राष्ट्रहित की अवहेलना हो सकती है, जिससे देश की सुरक्षा के प्रति जनता में असंतोष उत्पन्न होता है।
अंत में हम कह सकते हैं कि
भारत-पाकिस्तान युद्धविराम की घोषणा एक दोधारी तलवार के समान है। यह एक ओर शांति का मार्ग खोलती है, तो दूसरी ओर धोखे और विश्वासघात का भी इतिहास साथ लिए होती है। इसका औचित्य इस बात पर निर्भर करता है कि युद्धविराम के पश्चात दोनों देशों में संवाद, नियंत्रण और पारदर्शिता कितनी प्रभावी है।
शांति की पहल करना भारत की नैतिकता और वैश्विक भूमिका के अनुरूप है, परंतु सुरक्षा और सतर्कता की दृष्टि से इसे केवल एकतरफा भावनात्मक निर्णय न मानते हुए, रणनीतिक और व्यावहारिक चश्मे से देखा जाना चाहिए।

