प्रेरणा ! अंगदान कर देंगी कईयों को जिन्दगी, दो बहनें बनी मिसाल बेमिसाल
बलिया। आज के जमाने में जहां बहुतेरे लोग अपने ही खून के रिश्ते में रक्तदान करना अभी मुनासिब नहीं समझते हैं, डरते हैं। वहीं दो बहने अपनों के लिए नहीं गैरों के लिए अपने शरीर का दान करने का शपथ पत्र भर कर, मिसाल ए बेमिसाल बनने की जो बानगी पेश की है उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है। अटूट रिश्ते मैं बंधी दोनों बहनों ने अपने अंगदान करने की घोषणा करके न सिर्फ एक महान काम किया है बल्कि उन्होंने घोषणा के पहले बकायदे अपने बड़ी बहन और अपने बड़े भाई से इस कार्य करने की अनुमति ली। बहनों ने जब अपने बड़े भाई और बड़ी बहन को इस नेक काम के बारे में बताया तो पहले तो वह कुछ पल के लिए ठिठक गए लेकिन जैसे ही बहन के हौसले को देखा तो उन्होंने उन्हें सलाम करने के साथ इस नेक काम के लिए बधाई दिया और गले से लगा लिया।
अंगदान करने वाली यह दोनों बहने बलिया जनपद की रतसर कला नगर पंचायत की निवासी हैं और जिन्होंने सामाजिक व मानवीय मूल्यों की कसौटी पर खरा उतरने का काम अपने आंगन में अपने माता-पिता की छांव में सीखा है।
महर्षि दधीचि और शिबी जैसे राजाओं के शरीरदान की पौराणिक परंपरा तथा शरीरदान/अंगदान को भारत के खास मूल्यों,आदर्शों और समाज के संस्कारों के एक हिस्सा को देखते हुये, लेकिन वर्तमान में समाज में शरीरदान व रक्तदान के प्रति लोगो मे जागरूकता की बेहद कमी व अंधविश्वास को देखते हुये तथा वर्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन की रिपोर्ट देखकर रतसर बलिया की पूर्व प्रधान व पूर्व ब्लाक प्रमुख… की बेटी स्मृति सिंह व उनकी छोटी दीदी #दीप्ति_सिंह ने #देहदान का निर्णय अपने भईया व बड़ी दीदी से अनुमति प्राप्त कर लिया। ततपश्चात परिजनों के साथ बनारस जाकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय स्थित चिकित्सा विज्ञान संस्थान के शरीर रचना विभाग (Anatomy Department) की विभागाध्यक्ष को #देहदान का शपथ-पत्र समस्त औपचारिकताओं को पूर्ण कर दोनो बहनों ने अपनी इच्छा का हलफनामा सौप दिया।
आपको बताते चलें कि आज अवयव दान करने वालों की संख्या केवल 0.01% है और हर वर्ष 2 लाख किडनियों की आवश्यकता है तथा मिलती है केवल 6 हजार,लिवर चाहिए 50 हजार और ट्रांसप्लांट की जाती है 750, 11 लाख आँख की जरुरत पड़ती है और मिलती है केवल 100। इससे यह साबित होता है, हम अवयव दान के प्रति कितने जागरूक हैं, दूसरी बात हार्ट, किडनी, लिवर फेल के बहुत सारे केस (घटनाएं) हैं, मतलब हमें इसमें भी जागरूकता चाहिए, हम कारण का उचित निवारण भी सोंचे;तो हम कितनों की जिंदगी बचाने में मददगार बन सकते हैं। वहीं दूसरी तरफ चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान के लिए मृत मानव शरीर की भूमिका सर्वोपरि होती है,जो मानव शरीर के उपलब्धता के बिना संभव नहीं और आज मेडिकल कालेजो में इसकी बहुत ही कमी है। मृत्यु के बाद जीवन क्या है, इस फिक्र (विषय) में घुलते लोग शायद इस बात पर विचार भी नही करते कि उनका अपना मृत शरीर नेत्र, हर्ट वाल्व,ब्लड वेसल्स, हड्डी, त्वचा, मांसपेशियां, टेंडन्स यहा तक कि चेहरा एवं उंगलियों का समय से दान कर लगभग 100 लोगों की जिंदगियों में रोशनी ला सकता हैं। मरने के बाद हमारे सभी अंगों(शरीर) को खाक में मिल जाना है, कितना अच्छा हो कि मरने के बाद ये हमारे अंग खाक होने की जगह किसी को जीवनदान दे सकें ! धार्मिकता व आस्था की वजह से किये जाने वाले दान से भले ही लोगो को तत्कालीक लाभ हो जाये, लेकिन किसी का जीवन बचाने के लिए किए जाने वाले महादान से किसी भी चीज की तुलना नही हो सकती हैं।
देहदान का अर्थ है ‘देह का दान’ अर्थात किसी उत्तम कार्य हेतु अपना जीवन ही दे देना। राजकुमार सत्त्व ने सावकों को भूख से मरने से बचाने के लिए अपने शरीर का त्याग कर दिया था। दधीचि ने अपना शरीर इसलिए त्याग दिया था, ताकि उनकी हड्डियों से धनुष बनाया जा सके, जिससे दैत्यों का संहार हो सके। राजा शिवि ने कपोत को बचाने के लिए अपने शरीर को प्रस्तुत कर दिया था। अनेक समुदायों में देह को नदी में प्रवाहित करने की परंपरा है, ताकि पानी में रहने वाले विभिन्न जीवों को आहार उपलब्ध हो सके। पारसी समुदाय में मृत्यु के उपरांत देह को एक ‘कुएं’ में रखने की परंपरा है, ताकि पक्षी उस देह को आहार बना सकें। हमारे देश मे तो परिस्थिति वश व्यक्ति के मृतशरीर के उपलब्धता के अभाव में मृत व्यक्ति के पुतले को भी जलाकर उस व्यक्ति के मोक्ष की कामना की गई है।फिर देहदान में हमें झिझक बिल्कुल भी नही होनी चाहिये। एक नवजात से लेकर नब्बे वर्ष के बुजुर्ग तक अंगदान/देहदान कर सकते है। भारत मे हर वर्ष 5 लाख लोगों की मौत सिर्फ विभिन्न अंगों के नाकाम होने से होती है। वही दूसरी तरफ भारत मे हर वर्ष 1 करोड़ ब्लड यूनिट की जरूरत होती है, सोचिए ? अगर कोई रक्तदान न करे, तो फिर इस ब्लड की भरपाई कैसे होगी! एक स्वस्थ्य मनुष्य प्रत्येक तीन महीने में एक बार रक्तदान कर सकता है अर्थात वर्ष में 4 बार रक्तदान किया जा सकता है।
देहदान/अंगदान/रक्तदान करके न आप केवल एक और जीवन जीते है बल्कि पूरी मानवता को जीवन और एक उम्मीद प्रदान करते है। परिवार व समाज की सहमति से विज्ञान को देहदान/अंगदान करना आज समाज व समय की जरूरत है। नये बदलते युवा भारत को अंधविश्वास छोड़ना होगा तथा सामाजिक सन्दर्भ के अनुसार आध्यात्मिक दृष्टिकोण को फिर से परिभाषित करना होगा।
…आइये समस्त आशंकाओं व अंधविश्वासों को दूर कर अंगदान/शरीर दान का संकल्प ले व समाज मे देहदान व रक्तदान के प्रति लोगो में जागरूकता फैलाये तथा सबसे बड़े #महादान #शरीरदान तथा समय-समय पर #रक्तदान करके पुण्य के भागी बने।


