रचनाकार

डा. प्रमोद कुमार अनंग : “हे कुम्हार”

डा. प्रमोद कुमार अनंग…

है प्रकाश मिट्टी में, इसको समझ रहे केवल कुम्हार।
कठिन जिंदगी उनकी होती, दीपक को देते आकार।।

मगन हुए सोंधी खुशबू में, दिए सजाओ ले जाओ।
अधनंगे लोगों के मन में, आते कितने शुद्ध विचार।।

तन माटी का, जन माटी के, हम माटी के पुतले हैं।
माटी को ही इन लोगों ने, बना लिया जीवन आधार।।

श्रम का मूल्य कहां मिलता है,लेकिन जीवन चल जाता।
वसुंधरा के जैसी चाकी घूम रही , जीवन का सार।।

चकाचौंध की दुनियां में भी, संस्कृति अपनी जिंदा है।
दीपों के उत्सव को भी अब, निगल रहा है ये बाजार।।

खेल-खिलौने और भगवने, मिट्टी के बर्तन गढ़ते।
पंचतत्व से रोजी-रोटी, करते कभी नहीं व्यापार।।

चूल्हे कुछ दिन जल जायेंगे, दिये बिके दिवाली में।
नए-नए कुछ कपड़े लेंगे, खुश हो जायेगा परिवार।।

आई – गई कई संस्कृतियां, पर मिट्टी के दीप जले।
बदला नहीं कुम्हार का जीवन,बदल गया सारा संसार।।

मोम और बिजली की बत्ती से, जन-जीवन खतरे में।
परिभाषायें बदल गईं पर, बदल नहीं सकते त्योहार।।

हे कुम्हार! विश्वास हमें हैं, हार नहीं तुम मानोगे।
दिये जले हैं, दिये जलेंगे, कोई गाये गीत मल्हार।।

गढ़-गढ़कर तुम पका रहे हो,अपना जीवन खपा रहे हो।
तुम भी माटी से ही गढ़ते, तुम्हीं भुवन के रचनाकार।।

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