ज़िंदगी नहीं देती मौका, धरा पर ही है सद्गति…

अवंतिका विशाल…
पंजाब
ग़र करना चाहते हो इक़रार
तो क्यों है इन्कार
कर दीजिए इज़हार
जब करते ही हैं प्यार…!!
ग़र दिल में है कुछ – कुछ
आज ही है सब – कुछ
कल का पता नहीं
दिल से दर्द ज़ुदा नहीं…!!
मन में दबाए क्या बैठना
कह दीजिए फिर देखना
ग़र देगी किस्मत साथ
मिल जाएगा इक़ हाथ…!!
कोई बात रह गई अधूरी
हो जाने दीजिए पूरी
भूल कर सारे मतभेद
न मनाइए कोई ख़ेद…!!
माँगना चाहते हैं मांफी
न रह जाए मन में बाकी
सकूँ पाएगा दिल चैन
ख़ूबसूरत कटेगी दिन रैन…!!
करना चाहते हैं माफ़
मन कर लीजिए साफ
छोड़ दीजिए अहंकार
दे भी दीजिए अब दुलार…!!
लगाना चाहते हैं गले
तो लगा डाले इक़ बार
क्या भरोसा ज़िंदगी का
क्यों रखना है ख़ार…….!!
यहीं भूतो यहीं भविष्यति
पलट जाए शायद मति
ज़िंदगी नहीं देती मौका
धरा पर ही है सद्गति……!!

