रचनाकार

ममता से भीगा मन

@शब्द मसीहा केदारनाथ…

पिता को साइटिका की बीमारी के बाद वह बिस्तर पर पड़ गए थे । भाई-भाभी अपनी गृहस्थी अलग सम्हाल रहे थे और भाभी के पास दो छोटे बच्चे थे इसलिए वह भी मदद के लिए नहीं आ सकती थी । वंदना को जब पिता की बीमारी का पता चला तो वह मायके आ गई अपने बेटे के साथ ताकि माँ की मदद कर सके पिता की देखभाल में ।

रोज एक्यूप्रेशर होता । डॉक्टर की दवाएं दी जातीं । मगर पिता जी की हालत यह थी कि वह बिस्तर से उठना तो दूर अब बिस्तर पर ही पेशाब करते थे । जरा- सा भी हिलाने पर चीख पड़ते थे दर्द से । डॉक्टर ऑपरेशन के लिए कह चुके थे मगर साथ ही यह संभावना भी जता चुके थे कि निचला धड़ ऑपरेशन के बाद किसी काम का न रहे। अतः आल्टर्नेट थेरेपी भी इस्तेमाल की जा रही थी । माँ, पिताजी के बेड के पास जमीन पर गद्दा लगाए सो रही थी और मुन्ना भी उनकी बगल में वंदना ने लिटा दिया था । खुद कुर्सी पर बैठकर एक किताब पढ़ रही थी और तत्पर थी कि पिता जी को वह देखेगी और माँ आराम करे लेगी ।

रात करीब दो बजे वंदना की कुर्सी हिली तो उसने हड़बड़ाकर आँखें खोलीं।
“क्या हुआ पापा ?”

“बेटा अपनी माँ को जगा दे जरा और तू बाहर चली जा ….मैं पेशाब करूंगा।“ पिता जी अपनी बात कही।

“माँ क्यों , मैं भी तो हूँ न । माँ को सोने दो । बहुत परेशान रहीं हैं , अकेले सब काम करते हुए ।“ वंदना बोली ।

“अरे! तू ….”

“हाँ, मालूम है कि बेटी हूँ । बेटी की मर्यादा आपने खूब पालना की है । क्या आपने मेरे कपड़े नहीं बदले थे , क्या मुझे आपने नंगा नहीं देखा था ?”

“तब तुम बहुत छोटी थीं पर ….”

“पर क्या ? अब मैं आपसे बड़ी हो गई हूँ !!”

“नहीं …लेकिन जब तेरी माँ है तो …”

“मैं भी तो माँ ही हूँ अब । पापा ! अगर मेरी जगह कोई नर्स ये काम करती तो वह भी तो बेटी ही होती किसी की । अब आप बीमार हैं , आप मेरे लिए बच्चे हो गए हैं …. माँ को सोने दीजिये …मैं पॉट लेकर आती हूँ ।“

वंदना पेशाब कराने के लिए पॉट लेने चली गई । तकिया आंसुओं से भीग रहा था और मन ममता से ।

One thought on “ममता से भीगा मन

  • Rajesh singh

    अति सुंदर । प्रेरणाप्रद ।👌💐

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