लघुकथा : मजबूरी

✍️ सपना चन्द्रा, कहलगाँव भागलपुर बिहार…
मदनलाल तड़के सुबह ही उठकर मजदूरों की तलाश में निकल पड़ा था।
शहर से सटे पहाड़ी की तलहटी में करीने से बैठे मजदूरों को देखकर ,पास जा अपने आने का प्रायोजन बताते हुए पुछा,..”क्या तुममे से पाँच लोग मेरे साथ चलोगे..?”
“पैसे कितने लोगे अभी ही बात कर लो। मुझे हुल-हुज्जत पसंद नहीं।”
“काम के अनुसार तो बीस हजार लगेगें साहब..पीने -खाने का भी इंतजाम कर देना आप।”
“अरे नहीं,नहीं..बहुत बोल रहे हो!..और ये पीना -खाना तुम जानो।”
“फिर आप ही बताओ …कितना देगें..?”
दस दूँगा,मंजूर हो तो बोलो!..नहीं तो मैं आगे बढ़ूँ।
“नही बाबू!..इतने में तो नहीं हो पाएगा!..चलो पंद्रह दे देना।
काम भी ऐसा है कि हम इंसानों को पेट के लिए न चाहते हुए भी करना पड़ता है।”
ये तो तुम जानो,हम काम लेगें और तुम पैसे!.बात खत्म।
जो कह दिया सो कह दिया…न एक पैसा कम न एक पैसा ज्यादा।

फिर तो छोड़ो बाबू!.देख लो आगे।
वहीं कुछ दूर पर लाखन और हरिया भी बैठे -बैठे उन सबकी बात गौर से सुन रहा था।
मदनलाल के आगे बढ़ते ही हरिया ने टोका.”साहब!..हम आपका काम करने के लिए तैयार हैं।आप वो दस हजार हमलोग को दे देना बाबू।
“सोंच लो..तुम्हें पता है न काम क्या करना है।अपनी बात से मुकर मत जाना।”
नहीं बाबू!.आप नहीं जानते अभी हमें पैसों की कितनी जरुरत है!.और काम का क्या है ..कोई छोटा बड़ा नहीं होता।
ठीक है चलो !..घर पहुँचते ही माखनलाल ने वो जगह दिखाई।आदमी नरक की कल्पना को हकीकत में सामने देख ले।
माखनलाल की भलमनसाहत रही कि उसने दो बोतल भी दे दिए सुरा के।
नहीं साहब !..हम लोग इसके आदी नहीं हैं। माखनलाल मुस्कुराया और दूर जाकर बैठ गया।
एकबार हरिया और किशन ने एक-दूसरे को देखा!..पनीली आँखों से हामी भरी।
ईश्वर को प्रणाम कर अपने काम में लग गया।
मरता क्या न करता!.एक की पत्नी बीमार तो दूसरे की बेटी का लगन होना था। पैसों की सख्त जरुरत थी।
ढंग के काम के इंतजार में आज हफ्ता हो आया था। कहीं से कोई उम्मीद नहीं।
आज माखनलाल ही सही….
अपने तन-बदन की बदबू से उबकाई लेते हरिया ने कुछ आव देखा न ताव सारा बोतल गटक लिया। दूसरी किशन की तरफ बढ़ाते हुए कहा..गटक ले फिर काम में तेजी आ जाएगी।
काम समाप्त कर हथेलीयों की सिकुड़ी चमड़ी को खूब रगड़कर दोनों ने धोया।अभी भी शरीर से आती दुर्गंध से परेशान हरिया हाथों में नोट लिए बेटी का चेहरा याद करता रहा।
चलो भाई!..आज तुमलोग मिल गए तो मेरा काम हो गया।
एक बात बताओ! ..तुमलोग तो दिहाड़ी मजदूर हो न..?
हाँ साहब !..हूँ तो दिहाड़ी ही!..पर जरूरत की और मजदूरी की कोई जात नहीं होती।
