रचनाकार

लद्युकथा : कुत्ता सभा

@ शब्द मसीहा केदारनाथ…

कुत्तों ने एक आक्रोश सभा का आयोजन किया। कुत्तों को अपने नाम से चलाये जाने वाले मुहावरे या आदमी पर कसे जाने वाले फ़िकरे बिल्कुल भी पसंद नहीं थे। उन्हें अपनी प्रजाति का अपमान लग रहा था। कोई आम सभा तो थी नहीं …कुत्तों की सभा थी। कुछ कुत्ते तो बाकायदा सज सँवरकर आए थे । किसी के गले का पट्टा कीमती था तो कोई-कोई आदमी की तरह डायपर तक लगाए हुए था । मगर कुत्तों में आपसी नस्लीय कंपीटीशन साफ दिखाई दे रहा था।

भारतीय परिआह, चिप्पीपराई, मुधोल हाउंड, राजपलायम, कन्नी, तिब्बतीयन मसटिफ, कोम्बाई, रामपुर ग्रेहाउंड, जोनंगी, कुमाऊं मस्टिफ, बखरवाल….यानि की सभी भारतीय नस्लों के कुत्तों के साथ विदेशी कुत्ते यार्कशायर टेरियर , वायरहेयर्ड पॉइंटिंग ग्रिफ़न, व्हाइट शेफ़र्ड डॉग, वेस्ट साइबेरियन लाइका, वेईमारानर, टॉय फॉक्स टेरियर, टोर्न्जक, टेलोमियन, सेंट जॉन्स वाटर डॉग, सिंहला हाउंड, साइबेरियन हस्की, शार पेई, सलूकी, पग, पुली, पूमि, पुन्ग्सान डॉग, पोमेरेनियन, लैब्राडोर हस्की और भी कई तरह के कुत्ते जो अपना मूल निवास छोडकर आए थे सब यहाँ मौजूद थे। भाई होते भी क्यों नहीं, आदमी तो थे नहीं कि कभी एक न हो सकें। कुत्तों की अंतर्रास्ट्रीय इज्जत का सवाल जो था।

भले ही ये कुत्ते अलग-अलग रंग के थे, अलग-अलग देश के थे, अलग मालिकों के भी थे, पर अपने मुद्दे को लेकर एक थे। सभा का अनुशासन भी देखने लायक था। कुत्ते पूरी तरह शांत थे। और शांत क्यों नहीं होते भला …आदमी तो थे नहीं , जो बिना बात पर भौंकता रहता है। माफ कीजिये बोलता रहता है। बेशक आदमी कुत्ते पालता है, उनसे प्यार भी करता है और बीमार होने पर देखभाल भी करता है, लेकिन कुछ कुत्तों के मालिकों को देखकर लगता है कि कुत्ते ने मालिक को पाल रखा हो जैसे ….हा हा हा।

तभी सभापति ने बोलना शुरू किया। कुत्तों के कान खड़े हो गए। ठीक ऐसे ही जैसे पड़ोस के घर में कोई खूबसूरत महिला या युवती आ जाय तो आदमी का ईमान, धर्म ही नहीं साहब कुत्तों की तरह आँख कान पूंछ भी खड़ी हो जाती है.

“मेरे प्यारे मित्रो! भाइयो और बहिनों , मैं आपको बताना चाहता हूँ कि हम कुत्तों की इज्जत ये आदमी लगातार खराब कर रहा है। कभी हमारा नाम हिकारत की नजर से लेता है, कभी हमारे नाम से व्यंग कसता है। हम लोगों को देखकर आदमी का बीपी बढ्ने लगता है। हम कभी आदमी को बिना कारण नहीं काटते , लेकिन आदमी बिना बात उंगली करने की काला में माहिर है। आप लोग अपने सुझाव दे सकते हैं कि आप क्या करना चाहते हैं।“

“सभापति जी ! मेरा मालिक और मालकिन तो बहुत अच्छे हैं। जब मेरी सही से आँखें भी नहीं खुली थीं, तब वह मेरी माँ से अलग कर के ले आया था। उसने मुझे बहुत अच्छे से पाला, लेकिन मैं इस बात से परेशान रहता हूँ कि आदमी अपने माँ-बाप को घर से बाहर निकाल देना चाहता है। जब मैं भी बूढ़ा हो जाऊंगा तो क्या ये मालिक मेरे साथ भी ऐसा ही करेगा ? हमारे भविष्य का क्या होगा?”

“हाँ, तुम्हारी चिंता सही है, आदमी प्यार करना जानता ही नहीं है। उसमें तो किसी पेड़ जितना भी गुण नहीं है। जैसे-जैसे बड़ा होता है आदमी मक्कार और घाघ हो जाता है, जबकि पेड़ बड़े होने पर फल देता है, छाया देता है और मर जाने पर अपना सर्वस्व आदमी को सौंप देता है। तुम्हारा मालिक शायद तुम्हारे साथ ऐसा नहीं करेगा, क्योंकि आदमी तो आदमी से नफरत करता है, जानवरों से प्यार जताकर खुद को पशु प्रेमी सिद्ध करता है। अब तो आदमी इतना आदमीयत के दिखावे में डूब चुका है कि माँ-बाप का जन्म दिन मनाए या न मनाए मगर कुत्तों के जन्म दिन की फोटो, केक और बच्चे के साथ कुत्ते की फोटो इन्स्टाग्राम और फेसबुक पर जरूर डालता है।“ सभापति ने कहा।

“मेरे मालिक ने तो मुझे फैमिली ग्रुप में भी शामिल कर रखा है। वहाँ पर मेरे आगमन के दिन की पार्टी की सारी फोटो डाली थीं।“ एक कुत्ता बोला।

“अरे! मेरे पिल्ले के मालिक ने तो मेरे बेटे की मौत पर अपने बाल तक मुंडवा दिये थे। मैं जानता हूँ कि आदमी के बच्चे ने मेरे बच्चे को मारा था , मगर एसबीआर कर के बैठा हूँ कि उस आदमी को मेरे पिल्ले से प्यार था।“ एक और कुत्ता बोला।

“सब ढोंग है उसका। क्या उसने अपने कुत्ते के कातिल को मारा ? नहीं मारा होगा ….आदमी होता ही ऐसा है। उसे अपना बच्चा तुम्हारे पिल्ले से प्यारा था। ऐसे मालिक की तो बोटी-बोटी कर देनी चाहिए।“ एक कुत्ता बोला।

“मैं तो ऐसे आदमी की छाया से दूर रहना चाहूँगा और तुम बोटी-बोटी करने की बात कर रहे हो ।“ पोमेरेनियन कुत्ते ने कहा।

“मुझे तो इस बात का दुख है कि मेरे मालिक ने मुझे अपने बाप का नाम दिया है। मेरा रंग काला है तो मुझे कालू कहकर बुलाता है। आदमी का ऐसे अपने पिता का नाम लेकर बुलाना भी कोई इंसानियत है भला।“

“अरे! तुम बेकार ही गुस्सा करते हो, उसके बाप का नाम ही कालू राम था और तुम्हारा रंग काला है। ये बस एक संयोग है।“

“नहीं, वो अपने बाप का श्राद्ध करता है और माँ के मर जाने की दुआ मांगता है ताकि कमरा खाली हो तो मुझे बड़ा कमरा मिल सके।“

“तो फिर बुरा कैसे हुआ आदमी। तुम्हें अपने से मतलब रखना चाहिए, न कि सारी दुनिया से। माँ उसका पर्सनल मैटर है।“ एक देशी बखरवाल बोला।

“तू तो रहने ही दे। तेरा मालिक लेखक है। पहले तू पहाड़ में रहता था। अब तो तू ए सी में पड़ा रहता है। तेरे मालिक के गुण तुझमें आ गए हैं। जब देखो तब कुछ भी लिखता रहता है और नफरत फैलाता है कभी जाति की तो कभी धर्म की। उसे फटी में टांग अड़ाने की पुरानी आदत है। तभी तो आदमी उसका सम्मान करते हैं , क्योंकि उन्हें अपने जैसा ही शैतान लगता है।“ एक कुत्ते ने अपने कान हिलाते हुए कहा।

“ये टांग शब्द से ही नफरत है मुझे फिर चाहे टांग उठाने की बात हो या टांग अड़ाने की या फिर टांग में टांग फँसाने की बात हो। हर जगह पर आदमी कुत्ते की टांग का संदर्भ जरूर देता है। आदमी को शर्म आनी चाहिए। हम लोगों को कभी म्युनिसिपेलिटि के खंबे पर टांग उठाने वाला बताता है , कभी टांग उठाकर मूतने वाला कहता है, कभी चौपाया कहता है।“

“तो तू क्या चाहता कि चार पैर वाले को चौपाया भी न कहा जाय।“

“अरे जब चार पैर वाली पशु को माँ कह सकता है तो मुझे बाप कहने में उसका क्या घिसता है ? मैं तो गंदगी भी नहीं करता, जब भी फ़ारिग होने जाना हो हमेशा घर के बाहर जाता हूँ ताकि मालिक को गंदगी साफ न करनी पड़े, और एक वो है कि खड़ी हुई मूतती है , खड़ी हुई हगती है …हुंह।“ कुत्ते ने अपना मुंह बनाते हुए कहा।

धीरे-धीरे सभा में आदमीयत आने लगी थी। जब शोर बढ्ने लगा तो सभापति ने कहा-

“शांत हो जाओ दोस्तो। मुझे आपकी कई समस्याओं का पता चल चुका है। हम जल्द ही एक कुत्ता समाज का संविधान बनाएँगे, चुनाव भी होंगे और कुत्तों की मदद के लिए सहता कोश भी बनाया जाएगा। आप सभी का योगदान मिलेगा ऐसी मैं अपेक्षा करता हूँ। हम आज की सभा को समाप्त करते हैं और जल्द ही अगली मीटिंग की सूचना देंगे।“

“माफ करना सभापति जी ….मैंने भी टीवी पर देखा है कि न्याय के लिए सिर्फ तारीख पर तारीख …. तारीख पर तारीख… तारीख पर तारीख ही मिलती है। सन्नी देयोल ने जज से कहा था। आप भी तारीख की बात कर रहे हैं ….न्याय और सम्मान की बात कीजिये।“ कुत्ता रौबदार आवाज में बोला।

“हाँ, सभापति जी ….इसकी बात सही है।“

“मार्शल ! इन दोनों कुत्तों को बाहर करो । बहुत चिल्ला रहे हैं ….सालों को आदमीयत की बीमारी लग गई है।“ सभापति के ज़ोर से भौंकते ही कुत्ता सभा तेजी से विसर्जित होने लगी। वाकई में कई संवेदनशील कुत्ते व्यथित थे ….. आदमी की आदमी नहीं सुनते , पर कुत्ते को तो कुत्ते की सुननी ही चाहिए।

और तभी मेरी झपकी खुल गई । मैं गलती से बेटे के कमरे में सो गया था जहाँ पर ए सी 20 डिग्री पर चल रहा था। जब पेट भरा हो और आराम से कट रही तो व्यंग उड़ाने वाला ही हारता है।

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