साहित्यिक गीत : भूली बिसरी यादें

@ छंगूलाल गुप्ता मिलनजी…
कठिन कंटकाकीर्ण पथ है हमारा।
अगर हो सके तो सुपथ ही लखा दो।।
कठिन कंटकाकीर्ण पथ है हमारा।
ऊषा सी निशा घोर, तमतोम पूरित, नहीं हाथ को हाथ देता सुझाई।
घटा घोर घन की घिरी है गगन में,
कहीं चंचला ने अभी दीप्त पाई।।
सघन पादपावलि, निशाचर सद्रश ही,
हमें दिख रही भेद भ्रम ही मिटा दो।। कठिन कंटकाकीर्ण पथ है हमारा।
हुआ रुद्ध पथ है न सम्बल किसी का,
कहीं वन्य पशु का न बन ग्रास जाऊँ,
कहीं ब्रश्चिका उरग डस न लेवे,
इसी सोंच में धैर्य न बाँध पाऊँ।।
मनुजता मनुज की निहित जीव हित में,
अधिक न सही एक दीपक दिखा दो, कठिन कंटकाकीर्ण पथ है हमारा।
गगन बीच शीतल सुधाकर खिलें,
भ्रमात्मक दिशा तभी ध्रुव मिटायें।
तभी पंथ निर्विघ्न होगा हमारा,
जभी आप मेरी बाधा मिटायें।।
कमी आत्म बल की नहीं बन्थु मुझमें,
लिखा भाग्य में क्या यही तो बता दो।। कठिन कंटकाकीर्ण पथ है हमारा।

