“लघुकाय लघुकथा के लिए तेजी से उभरता नाम है संतोष सुपेकर” : सिद्धेश्वर

० कहानी को संक्षिप्त कर लघुकथा नहीं बन सकती है : ऋचा वर्मा
० वैश्विक लघुकथाकारों की रचनाओं का अध्ययन कर अपना लेखन करें तभी लघुकथाकार : संतोष सुपेकर
पटना। "लघुकथा का शब्द आते ही लघुकथा पढ़ने की इच्छा तीव्र हो आती है। इसका मूल कारण है कि साहित्य की कोई ऐसी गद्य विधा नहीं है जो इतने कम शब्दों में हमें गहन चिंतन करने को विवश कर दे। सामाजिकता से लैस अपनी लघुकाय लघुकथा के लिए तेजी से उभरता हुआ एक नाम है संतोष सुपेकर। संतोष सुपेकर की लघुकथा कृति" "सातवें पन्ने की खबर" से दो कदम आगे है उनकी नई लघुकथा कृति 'अपकेंद्रीय बल'। संतोष सुपेकर एक जागरूक लघुकथाकार हैं, जो समय और समीक्षा को अपने सामने रखकर सृजन करते हैं। उनकी लघुकथा कृति "अपकेंद्रीय बल" में आठ के कैम्प, मात्र क्षरण, बर्फ का ताला, अनायास ही, एनर्जी ड्रिंक, अपकेंद्रीय बल टॉपिक चेंज, मानवता गिरी, अंधेरा वितरण जैसी अनेक ऐसी मारक क्षमता रखने वाली लघुकथाएं हैं, जो लघुकथा के अंतिम संवाद के साथ हमें झकझोर देती हैं। यही लघुकथा का प्राण तत्व भी होता है। "भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वाधान में, फेसबुक के अवसर साहित्यधर्मी पत्रिका के पेज पर ऑनलाइन आयोजित हेलो फेसबुक लघुकथा सम्मेलन, का संचालन करते हुए, संस्था के अध्यक्ष सिद्धेश्वर ने, संतोष सुपेकर की नई लघुकथा कृति "अपकेंद्रीय बल" पर समीक्षात्मक टिप्पणी करते हुए उपरोक्त उद्गार व्यक्त किया। अपनी अध्यक्षीय उद्बोधन में ऋचा वर्मा ने कहा कि- भले ही आज लघुकथा और इसकी शैली पर बहुत ही विमर्श होता हो पर लघुकथा का इतिहास, पंचतंत्र की छोटी-छोटी कहानियां, सादात हसन मंटो द्वारा लिखी छोटे-छोटे अफसाने, और प्रेमचंद लिखित छोटी-छोटी कहानियों से ही शुरू हो गया था। आज के युग में मेरा मतलब है की अस्सी के दशक से शुरू होती हुई आधुनिक युग की लघुकथा जिसके विषय में बहुत सारी बातें होती हैं, अपने लघु आकर, मारक क्षमता और अपने आप में छिपे संदेशों के कारण लेखकों, पाठकों और हरेक पत्र-पत्रिकाओं के लिए एक लोकप्रिय और अनिवार्य विधा हो गई है। बताती चलूं की जिस तरह उपन्यास को संक्षिप्त करके कहानी नहीं बन सकती है उसी तरह कहानी को संक्षिप्त कर लघुकथा नहीं बन सकती है। "मुख्य अतिथि संतोष सुपेकर (उज्जैन) ने कहा कि - "एक छोटे से कंकड़ पर भी लघुकथा लिखी जा सकती है पर लम्बी,बेचैन रचनात्मक प्रक्रिया से गुजरकर ही।रचनाकर्म वैसे भी एक बैचेन कवायद है।जल्दबाजी एक क्लर्क की योग्यता हो सकती है पर एक लेखक की, कदापि नही। वैचारिकता को लेकर प्रतिबद्ध लेखक का प्रयास होना चाहिए कि वह एक निष्प्राण कंकड़ पर तो लिखे लेकन उसका लिखा निष्प्राण न होने पाए।आज के नए लघुकथाकार, उक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, विषय वैविध्य पर गौर करते हुए, वरिष्ठों की, अन्य वैश्विक लघुकथाकारों की रचनाओं का अध्ययन कर अपना लेखन करें तभी लघुकथा का भविष्य और उज्ज्वल होगा। इस लघुकथा सम्मेलन में पूनम कतरियार की लघुकथा '‘शारदोपासक"/ फिल्म निर्माता निर्देशक और अभिनेता अनिल पतंग ने - "कानून"/ डॉ अनुज प्रभात ने' अजनबी' / डॉ योगेंद्र नाथ शुक्ल की लघुकथा -" दिवसों का दर्द "/ मंजू सक्सेना (लखनऊ) ने-" बदलाव "/रशीद गौरी (राज.) ने -" ममता की तरफ "/ ज्वाला सांध्य पुष्प ने -" एक तीर दो निशान "/ निर्मल कुमार डे (जमशेदपुर) -सर्दी / राम मूरत राही की लघुकथा -" इंसान नहीं " (फिल्म निर्माता: अनिल पतंग)/ सिद्धेश्वर की लघुकथा -" सिमटती दूरियां "( लघु फिल्म निर्माता : अनिल पतंग )/ मीना कुमारी परिहार ने -पासा पलटना / संगीता गोविल ने -" सपनों की राह "/ पुष्प रंजन ने - बीज मंत्र / सपना चंद्रा ( भागलपुर ) ने - मजबूरी / रामनारायण यादव( सुपौल) ने- सुयोग्य उम्मीदवार / विजयानंद विजय (बोधगया ) ने -तार तार संवेदना "?/राज प्रिया रानी ने - हैप्पी मदर्स डे ?/ऋचा वर्मा ने - और ऐसी लग गया / डॉ शरद नरायण खरे (म.प्र.)ने -" धर्म परायणता" शीर्षक लघुकथाओं का पाठ किया। इनके अतिरिक्त संतोष मालवीय, दुर्गेश मोहान, अपूर्व कुमार, नरेश कुमार, अमरजीत कुमार, नन्द कुमार मिश्र, भावना सिंह, ज्योत्सना सक्सेना, बृजेंद्र मिश्रा, खुशबू मिश्र, डॉ सुनील कुमार उपाध्याय, अनिरुद्ध झा दिवाकर, बीना गुप्ता, स्वास्तिका, अभिषेक आदि की भी भागीदारी रही।

