लद्युकथा : कांदा छीलने को नहीं हूँ

@ शब्द मसीहा केदारनाथ…
“अरे ओ …….. सब लोग जरा बाहर आओ ….इधर आओ। देखो तो सही तुम्हारी माँ को क्या हो गया।” जैसे ही पिता की आवाज सुनी उनका चौबीस साल का बेटा, बहू बाहर आ गए। पीछे-पीछे उनकी बेटी भी आ गई।
“क्या हुआ? पापा! आज आप इतनी जोर से चिल्ला क्यों रहे हैं?” बहू ने पूछा।
“बेटा! यह बात ही चिल्लाने के क़ाबिल है। मुझे तो लग रहा है कि पागल खाने से एंबुलेंस बुलानी पड़ेगी।” वह जोर से हँसते हुए बोले।
“अरे….. बाबा! आखिर क्या हुआ है, जो घर में एंबुलेंस बुलानी पड़ेगी ? कौन बीमार हो गया है।” बेटी ने अपने पिता की तरफ हैरानी से देखते हुए कहा।
“है एक…. उसने आज अपना संदूक खोला, और उसमें से उसने अपने घुँघरू ढूंढ निकाले और अपने पैरों पर बांध लिए। अब वह टी वी पर अपना डांस दिखाना चाहती है।” पिता हँसते हुए दोहरे हुए जा रहे थे।

“आपकी कोई दोस्त है? आपके किसी दोस्त की बेटी है?” बेटे ने पूछा।
तभी माँ के कमरे से छन-छन की आवाज आने लगी और माँ अपने पैरों में घुंघरू बांधे हुए उन सब के पास आकर खड़ी हो गई।
“तुम्हारे पिता पागल खाने की एंबुलेंस मेरे लिए बुला कर मुझे पागलखाने भेज देना चाहते हैं। मैं तुमसे एक सवाल पूछना चाहती हूँ।” माँ ने कहा।
“क्या सवाल है माँ?” बेटे ने कहा।
“हा हा हा…. इसका सवाल भी इसी की तरह होगा। इसके पैरों में घुंघरू देख कर भी तुमको नहीं लगता है कि यह क्या करना चाहती है।” पिता ने कहा।
“अरे बाबा ! माँ को अपना सवाल तो पूछने दीजिये ?” बेटी ने टोकते हुए कहा।
“बेटी! इनको मेरी बात कभी समझ नहीं आएगी, क्योंकि ये पति हैं, मर्द हैं, पर औरत नहीं हैं। और मेरी बात शायद तुम्हें भी समझ नहीं आएगी, इसलिए मैं अपनी बहू से भी उम्मीद नहीं करती हूँ कि वह मुझे समझ पाएगी, लेकिन मुझे कहना तो है।” माँ ने कहा। सबका ध्यान माँ की आँखों की तरफ और माँ उन के चेहरे पर था।
“माँ! आप अपना सवाल पूछो।” बहू ने कहा।
“मुझे बस इतना ही पूछना है कि क्या मैंने तुम सबको पालने-पोसने में कोई कमी की है? क्या तुमसे मैंने कम प्यार किया है?” माँ ने उन सब की तरफ देखते हुए कहा।
“नहीं माँ, मैं भी आपको देख रही हूँ कि आप पूरे घर परिवार को किस तरह से संभालती हैं। मैं खुद सुबह चार बजे नहीं उठ पाती हूँ लेकिन आपने मुझे हमेशा अपनी बेटी की तरह माना है। उल्टे आप इन से कहती हैं कि बहू को कहीं बाहर घुमा कर लाया कर। जबकि मैं इस घर में आई थी तो मुझे लगता था कि अब मेरी आजादी खत्म हो गई।” बहू ने कहा।
“तुम्हें ऐसा लगता था, लेकिन मेरी आजादी तो कब से गिरवी पड़ी है। मैंने अपने पति को आगे बढ़ाने के लिए जी जान एक कर दिया। मेरी अपनी तबीयत कैसी भी रही हो, मैंने खाना भी बनाया, कपड़े भी धोए…. हर तरह से घर का ख्याल रखा, तुम्हारे बाबूजी का ख्याल रखा। फिर तुम दोनों पैदा हो गए तो बाबूजी का ख्याल कम करके मैंने तुम दोनों का ख्याल ज्यादा रखना शुरू किया। तुम भी अपनी जिंदगी में कामयाब हो गए, तुम्हारा अपना घर परिवार बन गया।” माँ ने उन चारों की तरफ देखते हुए कहा।
“हाँ माँ, आपकी बात में पूरी सच्चाई है। इसमें तो पागलपन जैसी कोई बात नहीं है।” बेटे ने कहा।
“लेकिन मेरी बात में सच्चाई है, इस बात को मुझे कहने की कभी जरूरत नहीं पड़ी। तुम लोग बस मुझे हमेशा काम करते हुए देखते रहे। मैं जब आठवीं कक्षा पास करके बड़ी हो रही थी, तब मेरी माँ को चिंता थी कि मुझे अगले घर जाना है। मैं नृत्य करना चाहती थी, मैंने नृत्य सीखा था। शादी हुई तो इस घर के संस्कार अपनाने पड़े। मैंने अपने आप को दबा कर रखा…. अपनी इच्छाओं का गला घोटकर रखा। आज न जाने क्यों मेरा मन कर आया और मैंने अपनी सांसों को खोल कर उसमें से यह घुंघरू निकाल लिए। मैंने इन घुंघरू में अपने बचपन को क़ैद पाया…मेरी अधूरी साँसे वहाँ सन्दूक में क़ैद थीं । कम से कम अब तो मेरे ऊपर कोई बोझ नहीं है। मेरा पागलपन बस इतना ही है कि मैंने अपने उन्हीं ख्वाबों को अपने पैरों में बांधकर नृत्य करने का मन बनाया है। अगर तुम सबको मेरा खुश रहना, इतने साल अपनी जिंदगी को तुम सब की खुशी के लिए तुम्हारी तरह से जीना…. यह सब करने के बाद भी मैं तुम्हारे पिता की नजरों में पागल हूँ, मुझे पागलखाने भेज देना चाहिए। हँसी के मारे इनके पेट में बल पड़ रहे हैं। इन्हें ख़ुद पर भरोसा नहीं है और मेरा भरोसा कमजोर कर रहे हैं । पर मैं तुमसे एक सवाल पूछना चाहती हूँ…. तुम्हारे पिता मेरे पति से दो बच्चों के बाप बने। इतने बरस एक साथ रहते हुए हमने गुजार दिए…. किसी ने मेरी इच्छा कभी नहीं पूछी। आज मैंने खुद अपनी इच्छा को तुम्हारे पिता के सामने रखा और अब तुम सबके सामने रख रही हूँ …. तुम सब अपनी अपनी जिंदगी में आगे निकल गए…. सफल भी हो गए, लेकिन मैं तो वहीं की वहीं खड़ी हूँ। आज मैं अपने घुंघरुओं के साथ जीना चाहती हूँ…. तुम सब लोग क्या चाहते हो कि मैं हमेशा की तरह रसोई में कांदा छीलती रहूँ?” माँ ने अपनी बात कहकर अपने पैरों के घुंघरुओं को इस तरह बजाया जैसे कि एक नहीं सैकड़ों सवाल हर घुंघरू को अपना मुँह बनाकर पूछ रही हो।
पति, बेटा और बेटी भी इस सवाल को सुनकर चुप खड़े हो गए थे। तभी बहू आगे बढ़ी और अपनी सासू माँ के गले से जा लगी और बोली- “माँ जी, मैं आपकी सारी बात समझ गई हूँ। आपका कहा एक एक शब्द सच्चा है। औरत की आजादी हमेशा एक पागलपन रही है। हजारों सालों से हमें सिखाया ही यह गया है कि औरत त्याग की मूर्ति है। पर कभी किसी ने यह कोशिश नहीं की कि औरत से भी पूछा जाय कि उसकी ख्वाहिश क्या है। अब आपको अकेले कांदे छीलने की जरूरत नहीं है। घर में नौकरानी काम करेगी, हम दोनों भाभी- ननद अब इस घर का काम देखेंगे। हम भी देखना चाहते हैं कि आप टेलीविजन पर अपने घुंघरुओं को छनकाते हुए आयें तो पापा जी कैसे ताली और सीटी नहीं बजाते हैं। माँ! दुनिया को दिखा दो कि आप सिर्फ कांदा छीलने को नहीं बनी हो।”
और कमरा सिर्फ तालियों से नहीं बल्कि घुंघरुओं की आवाज से गूंजने लगा।

