रचनाकार

धरती की पुकार

@ किशोर कुमार धनावत, रायपुर (छ.ग.)

“पृथ्वी दिवस पर मन के भाव”

मुझे तुम कहते हो माता,
कहाँ निभाते हो नाता?
भोजन देती पानी पिलाती,
क्या कुछ समझ में आता?
यहीं हुआ है जन्म तुम्हारा,
मैंने पाला-पोसा और संवारा|
अपने स्वार्थ में ऐसे डूबे तुम,
भूल गये सब उपकार हमारा|
कुछ तो बदलो व्यवहार को,
जाओ पेड़-पौधों को लगाओ|
वातावरण भी सुरम्य होगा,
और शुद्ध प्राणवायु को पाओ|
तब धरती ने कहा:-
मेरी मिट्टी से बना तन तेरा,
मत कर तू इतना अहंकार|
बाग-बगीचे हैं प्यारे मुझको,
मत उजाड़ो मेरा घर परिवार|
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