फ़िदा भी न क्यूँ हो ये ‘हरिलाल’ तुझपे, ग़ज़ल तेरे जलवे निराले बहुत हैं

हरिलाल राजभर…
गलतफहमियाँ जो भी पाले बहुत हैं,
पड़े जह्न में उनके छाले बहुत हैं ।
सदा तंज कसना ही जिनकी है फितरत,
समझ लें कि वो दिल के काले बहुत हैं ।
हँसे सूप पे क्यूँ ये छलनी मचलकर,
कि छेदों के जिसमें ही झाले बहुत हैं ।
अँधेरा भी अब मात खाया है मुझसे,
मेरे कल्ब में जो उजाले बहुत हैं ।
ज़रा बदजुबानी पे अपनी लगाओ,
जहां में नसीहत के ताले बहुत हैं ।
किसी फन में उस्ताद ख़ुद को न समझो,
ज़मीं आसमां तक जियाले बहुत हैं ।
न दम तोड़े तो फिर करे क्या ये प्रतिभा,
हर इक राहों में रौब वाले बहुत हैं ।
ये जबसे सियासत बिकी हाय तबसे,
गरीबों के महँगे निवाले बहुत हैं ।
चलो आँखों से अब करें मयकशी हम,
भरे हुस्न के देखो प्याले बहुत हैं ।
फ़िदा भी न क्यूँ हो ये ‘हरिलाल’ तुझपे,
ग़ज़ल तेरे जलवे निराले बहुत हैं ।
कुचहरा, बिजपुरा, मऊ, उ० प्र०
९४५२८१००४९ ✍️


हरि लाल हार्दिक बधाई
अभिनंदन 🌷 🌷
अध्यक्ष महात्मा गांधी साहित्य मंच गांधीनगर Mo 8849794377