बसंती कुलेल

@ अंतिमा सिंह "गोरखपुरी"…
मादक पवन लेके महकी है बगिया,
दिन-दिन बढ़ती बसंत की बहार है।।
बौर से लदाये बौराय गये आम्र-वृंद,
झूम-झूम करते अनंत सत्कार हैं।।
चूमने को आतुर हुआ ही जाये आसमां,
देखो ना निहारे कैसे सृष्टि का शृंगार है।।
रंग-ओ-गुलाल लेके मोहन चले हैं देखो,
बरसाने से चलीं वो राधे सरकार हैं।।
यमुना के तीरे देखो होली महारास मोहे,
जन-जन बरसाने की ही चले राह है।।
नयन निरखि निज पावन करें हैं मन,
दग्ध-दिलों की सब मिट जाती आह हैं।।
नियति है प्रकृति का कौन भला तोड़ सके,
अबुध अनूप मनोवृत्तियाॅं निसार हैं।।
माना की हैं परब्रम्ह कान्हा नहीं कोई और,
पर बिना राधारानी वे भी निराधार हैं।।

