रचनाकार

“बैर भाव को जगह नहीं”

@ प्रमोद कुमार अनंग…

यह देश नहीं गद्दारों का।
यह देश है रिश्तेदारों का।।
विविध बोलियां भाषाएं।
संस्कृतियों संस्कारों का।।
ऋषियों मुनियों का देश यही।
ऋतुओं का देश बहारों का।।
‘अतिथि देव भव’ की थाती।
बहुविध उतरे अवतारों का।।
सपेरों का देश नहीं कहना।
मूल्यों के पहरेदारों का।।
संसार अनुकरण करता है।
ऐसे – ऐसे किरदारों का।।
मिलजुलकर रहने आता है।
संबंधों का परिवारों का।।
शत्रुता नहीं आती हमको।
रक्षा करते अधिकारों का।।
है बैर भाव को जगह नहीं।
ये धरा है प्रेम फुहारों का।।
हर प्राणी का मान यहां।
संवादों का व्यवहारों का।।
ये धरती आत्मज्ञान की है।
शांति के पैरोकारों का।।
यह देश है रिश्तेदारों का।।…”अनंग “

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