बहुतेरे हिन्दू-मुस्लिम मोख्तारवादी हैं, अपने ही बेटे को विरासत क्यों ?

@ आनन्द कुमार…
मऊ। राजनीति के ड्रामेबाजों के बीच मेरे शहर अपना मऊ की पहचान खोती सी जा रही है। अब यह शहर अलगू राय, झारखण्डे राय, जयबहादुर सिंह, कल्पनाथ राय, बड़े मौलाना, फिज़ा इब्ने फैजी, हबीबुरर्हमान नोमानी, मौलाना अब्दुल बाक़ी, अब्दुल लतीफ़ नोमानी, खैरूलबशर अंसारी, पंडित श्याम नारायण पाण्डेय आदि के नामों से नहीं जाना जाता। अब इसकी पहचान मोख्तार अंसारी के नाम से हो गई है। विकास के मामले में मेरे शहर का नाम भले ही वर्षों से गुमनाम हो गया हो, लेकिन मोख्तार के नाम पर मेरे शहर की पहचान मऊ में ही नहीं, पूर्वांचल व उत्तर प्रदेश सहित देश के कई प्रदेशों से लेकर सम्पूर्ण भारत और विश्व के कई हिस्सों में है। इस पहचान को लेकर आप अपना सिर गर्व से ऊंचा करिए या झुका लीजिए। लेकिन यही असल सच्चाई है कि मेरे मऊ की यही एक सीमित पहचान रह गई है। इतिहास के अमिट पन्नों में मऊ को हमेशा नई ऊंचाई देने वाले मेरे शहर के वे रहनुमा जो अब हमारे बीच में नहीं हैं, अब उनका अस्तित्व, उनकी गाथा भी थम सी गई है। अब हमें मोख्तार के शहर मऊ के नाम से जाना जाता है। मऊ की पहचान की इस गुमशुदगी की कहानी 25 वर्ष पूर्व जो लिखी जानी शुरू हुई तो चलती रही और फिर धीरे-धीरे इतिहास के फनकारों के नाम धूमिल होते गए। तीन दशक तक की उम्र पार कर चुका और इससे कम आयु का युवा इन मऊ के युग पुरुषों के नामों को नहीं जानता।
इसी बीच हम 20वीं सदी से 21वीं सदी में प्रवेश कर गये और तभी से मऊ अपनी असल पहचान खोता गया। और हम धीरे धीरे मोख्तार के मऊ वाले होते गये। जिस मऊ के फिजा इब्ने फैजी के साहित्य के शब्द अब भी कई देशों में गूंजते हैं। जहां के वीर रस के कवि पंडित श्याम नारायण पांडेय की कविताओं पर पूरा देश झूमता है। जिस अलगू राय शास्त्री और झारखंण्डे राय के नाम पर भारत की सियासत बोलती है, जहां जय बहादुर सिंह, कल्पनाथ राय, हबीबुर्रहमान नोमानी जैसे पूर्व सांसदों की अलग एक पहचान है। जहां पर खैरुल बशर अंसारी जैसा नेता जो अपनी सादगी और अपनी राजनीतिक जुनून की बदौलत जाना जाता रहा है, जहां के बड़े मौलाना के प्रति पूरा देश श्रद्धा रखता है। जहां के ताना-बाना को भारत में ही नहीं विश्व में एक पहचान मिलता हो। जहां के जनसंघी विधायक रामजी सिंह को न सिर्फ मुस्लिम घरों में ठिकाना मिलता था, बल्कि उन्हें चुनाव में इसी समाज से आर्थिक मदद भी मिलती थी। जिस शहर के हिन्दू मुसलमान को ताना-बाना भी कहा जाता है। जिस शहर को देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कभी भारत का मैनचेस्टर बोला हो। अब वह शहर अपनी असल पहचान के लिए गुमनाम सा हो गया है। और उसकी पहचान का हमनाम कोई हुआ तो वह है मोख्तार अंसारी का नाम जो ठीक नहीं है। इस शहर के लिए, इस शहर के हर हिंदू और मुसलमान के लिए और उसके आने वाली पीढ़ी के लिए।
आखिर क्यों और कब तक हम मऊ को इस नाम से जानते रहेंगे। कब तक हम लोगों को यह बताते रहेंगे कि, हां हम मोख्तार वाले मऊ के शहर व जिले के रहने वाले हैं। यह बातें मोख्तार सहित और उनके नाम पर विरासत को संभालने की कोशिश करने वाले अब्बास अंसारी और उनके समर्थकों को बुरी लग सकती है कि आखिर हम क्यों ऐसा लिख रहे हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि अगर वह भी अपने सीने पर हाथ रखकर खुद से यह सवाल करेंगे कि क्या मऊ की यही पहचान है?, तो उनको भी खुद से जवाब मिल जाएगा उन्हें इस दर्द से नाराज होने की जरूरत नहीं है बल्कि उन्हें समझने की जरूरत है कि कल मऊ कहां था और आज मऊ कहां है। ठीक है कि मोख्तार अंसारी को मऊ की जनता ने उन्हें वह सम्मान दिया, उन्हें वह स्थान दिया जिसके लिए वह यहां आए थे लेकिन एक नहीं दो नहीं तीन चार पांच -पांच बार विधायक होने के बाद आखिर उन्होंने मऊ को क्या दिया है। यह उन्हें सोचना होगा जब तक स्वयं मऊ से चुनाव लड़ रहे थे तब तक तो ठीक था लेकिन अगर वह नहीं लड़ रहे तो विरासत और ताजपोशी अपने ही बेटे की क्यों?,
मऊ में तो और भी बहुतेरे हिन्दू-मुसलमान के ऐसे चेहरे हैं जो उन्हें 25 वर्ष तक आंख मूंद कर सपोर्ट करते आ रहे हैं और उनके साथ हर बार दल बदलते रहे हैं। जब उन्होंने बसपा का झण्डा थामा, तो मोख्तारवादी लोगों ने जयभीम के नारे के साथ मायावती जिन्दाबाद का नारा लगाया। जब उन्होंने निर्दल भाग्य आजमाया तो मोख्तारवादी लोग सभी दलों के झण्डे से नफ़रत कर मोख्तार के जयकारे लगाएं। जब मोख्तार अंसारी राजनैतिक गुरू बड़े भाई अफजाल अंसारी ने कौमी एकता दल का गठन किया तो मोख्तारवादियों ने नये रंग के झंडे व नये कलेवर के गमछे के साथ मऊ ही नहीं की जनपदों में हुंकार भरी। और फिर जब मोख्तार ने हाथी की सवारी की तो सब हाथी के साथ हो लिए। जब मोख्तार हाथी से उतर छड़ी के सहारे साइकिल पर चढ़े और किन्हीं व्यक्तिगत व टेक्निकल कारणों से स्वयं मऊ सदर से नामांकन नहीं किए तो मऊ की गद्दी हजारों हिन्दू-मुस्लिम मोख्तारवादी में से किसी एक को न देकर अपने ही बेटे अब्बास अंसारी को दे दिए जो उनके अपनों और गैरों दोनों के गले नहीं उतर रहा। आखिर ऐसा क्यों?, 25 सालों से मोख्तार का आंख मूंद कर समर्थन करने वालों में क्या ऐसा कोई हिन्दू या मुसलमान नहीं मिला, जिसे चुनाव लड़ा कर मोख्तार यह ताल ठोक कर कह सके कि लो मऊवालों मैं सिर्फ गंगा यमुना तहजीब की बात ही नहीं करता बल्कि उस पर अमल भी करता हूं। खैर मऊ में वोट देने वाले और वोट न देने वाले दोनों को, अंसारी बंधुओं की यह बात खटक रही है आखिर ऐसा क्यों हुआ। चेहरे तो बहुतेरे थे। मोख्तारवादी में हिन्दू मोख्तारवादी ना सही मुस्लिम मोख्तारवादी ही सही मोख्तार एण्ड कम्पनी को उन्हें प्रत्याशी बनाना चाहिए था, हजारों चहेतों की विरासत पुत्र को ही क्यों ? खैर जनता आप अपने वोट के मालिक हैं, आप जिसे चाहे वोट दीजिए। आप अपने वोट के मालिक हैं। लेकिन मऊ की पहचान मोख्तार से कब तक, यह सोचना होगा, समझना होगा और तय करना होगा। हमें इतिहास में नहीं अपने अंदर अलगू राय, झारखण्डे राय, बड़े मौलाना, फिज़ा इब्ने फैजी, हबीबुरर्हमान नोमानी, जयबहादुर सिंह, कल्पनाथ राय, खैरूलबशर अंसारी, पंडित श्याम नारायण पाण्डेय, लल्लू बाबू, रामगोपाल खण्डेलवाल, रामजी सिंह को ढूंढना होगा।


