सदर का हाल मत पूछो, सदर की चाल मत पूछो

मेरी कलम से…
आनन्द कुमार
खरगोश, कछुए सा है दौड़,
तुम रफ्तार ना पूछो।
सदर का हाल मत पूछो,
सदर की चाल मत पूछो।
जो भ्रम में हैं वे गिर सकते,
जो संभले हैं वे चल सकते।
समर्थक अपने में उलझे हैं,
जनता की धार ना पूछो।
लड़ाई तीन की रोचक,
कहानी यही सामने है।
मगर दो के मुकाबले की,
तुम ललकार ना पूछो।
कोई जानवर के नामों पर,
खुद को बाजीगर समझ रहा।
मगर यहां आदमी की लड़ाई है,
इंसानियत का राज ना पूछो।
कुछ विभीषण की पहचान,
हो चुकी है रावण की भूमिका में,
ऐसे मुस्कुराते चेहरों का,
तुम मुझसे अंदाज ना पूछो।
आग कई प्रकार की सुलग रही,
मऊ के दर्द को लेकर।
तुम उसके अहसास ना पूछो,
तुम उसके विश्वास ना पूछो।
चलो निकलो तुम घर से,
तुमसे बस यही विनती हमारी है।
खुद से खुद को पूछो,
मऊ को जो संवार सके उसे वोट दे दो।
उसकी जाति न पूछो,
उसका धर्म न पूछो।
सदर का हाल मत पूछो,
सदर की चाल मत पूछो।

