आस्था

समाज सुधार एवं धर्म…

(डा. गंगा सागर सिंह विनोद )

मनुष्य जाति को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाला एवं सबसे सशक्त माध्यम धर्म है। इसीलिए कार्ल मार्क्स ने कहा था- “Religion is opium of people” अर्थात् धर्म नशा है। दुनियां का सबसे पुराना एवं वैज्ञानिक आधार वाला धर्म सनातन हिन्दू धर्म है। इसीलिए यह कहते हैं कि हिन्दू धर्म, धर्म नहीं एक जीवन शैली है। समाज सुधार के लिए धर्म सबसे सशक्त माध्यम है क्योंकि हर धर्म मानवता का पाठ पढ़ाता है।कोई भी धर्म भ्रष्टाचार एवं आचरण हीनता की शिक्षा कत्तई नहीं देता है। राजतंत्र एवं तानाशाही शासन में आम जनता, राजा एवं तानाशाह के दबाव के अनुरूप धर्म के आचरण पर चलने को बाध्य होता है लेकिन आज लोक तंत्र लगभग सभी देशों में है। येन केन प्रकारेण संख्याबल अर्थात् बहुमत प्राप्त करने की होड़ से धर्म का विकृत रूप आज देखने को मिल रहा है। धर्म प्रचारक/धर्म गुरुओं पर समाज सुधार की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी है लेकिन क्या आज वे लोग सही ढंग से इस जिम्मेदारी का निर्वाह कर रहे हैं। धर्म के नाम पर मन्दिरों एवं धर्म गुरूओं को मिलने वाला चढ़ावा जिस अकूत सम्पत्ति को पैदा कर रहा है, वह ईमानदारी एवं स्वयं के पसीने की कमाई से कितने लोग देते हैं एक ज्वलंत प्रश्न है। अतः लाखों-करोड़ों का एक मुश्त दान लेने से पहले अगर मंदिर प्रशासन एवं धर्म गुरू उस धन की पवित्रता पर ध्यान देने लगें एवं यह दृढ़संकल्प कर लें कि बड़े-बड़े दान/चढ़ावा (गुप्त दान) ब्लैकमनी से कत्तई नहीं स्वीकार करेंगे तो धर्म के माध्यम से समाज सुधार की प्रक्रिया निश्चित शुरू हो जायेगी। धर्म गुरू “सादा जीवन,उच्च विचार” के प्रतिमूर्ति होने चाहिए। लेकिन बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि ऐसे आदर्श धर्म गुरूओं के पास बहुत कम लोग जाते हैं। अर्थात् भौतिक चमक दमक एवं पांच/सात सितारा संस्कृति के धर्म गुरूओं की धार्मिक सभाओं में अपार जन समूह उमड़ पड़ता है। समाज पर ऐसे धर्म गुरूओं की बहुत ज्यादा पकड़ होने के कारण ये लोग राज नेताओं के लिए वोट बैंक का कार्य करते हैं। तभी तो उनके वहां बड़े-बड़े नेता एवं मंत्री बड़ी बड़ी थैली का गुप्त दान लेकर हाजिरी लगाते रहते हैं। और इन नेताओं की करतूत जग जाहिर है। धर्म समाज सुधार का अचूक रामबाण है। समय-समय पर इस पृथ्वी पर अनेक समाज सुधारकों का जन्म हुआ एवं वे अपने लक्ष्य में कामयाब रहे। बहुत से समाज सुधारक विश्व प्रसिद्ध भी हुए उनके कर्मों की सुगंध विश्व व्यापी हुई है। महात्मा बुध्द, जैन, ईशा मशीह, मोहम्मद साहब, गुरुनानक, कबीर दास, रहीम दास, सूरदास एवं तुलसीदास आदि नाम विश्व विख्यात हैं। लेकिन इन महान समाज सुधारकों के अनुयाइयों ने अलग-अलग धर्म एवं पंथ को जन्म दिया एवं होड़ लगातार अपने-अपने धर्म/पंथ के प्रचार प्रसार में लगे हुए हैं। कुछ धर्म प्रचारक कट्टर पंथ का सहारा लेकर आज विश्व के लिए चुनौतीपूर्ण हो गये हैं। धर्म, सत्य एवं प्रेम का वह मार्ग है जिसपर चलकर मनुष्य मोक्ष एवं “अनन्त सुख एवं शान्ति” को प्राप्त करता है। धर्म गुरू वह व्यक्ति है जो धर्म के उस मार्ग को प्रदर्शित करता है एवं स्वर्ग के मार्ग को प्रशस्त करता है। धर्म परमाणु विच्छेदन (परमाणु ऊर्जा) सिद्धांत के समान है। परमाणु ऊर्जा से आज विश्व कितना लाभान्वित हो रहा है यह सर्वविदित है। लेकिन उसी परमाणु ऊर्जा के सिद्धांत से पूरे विश्व में परमाणु बमों जखीरा रखा हुआ है तथा कुछ देश उसके निर्माण में लगे हैं। इन परमाणु बमों की विध्वंषक क्षमता का ट्रेलर हीरोसीमा एवं नागा शाकी में विश्व युद्ध के दौरान दुनियां देख चुकी है। धर्म का सदुपयोग कर पृथ्वीलोक को स्वर्ग बनाया जा सकता है तथा इसके विपरीत धर्म के नाम पर आपसी वैमनस्य पैदा कर इस पृथ्वीलोक को नर्क बनाया जा सकता है यह शाश्वत सत्य है कि इस संसार में केवल धर्म शब्द ही ध्रुव सत्य है।धर्म के आगे हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन आदि शब्द मिथ्या हैं। अतः जो मिथ्या है उसे मिटा देना चाहिए। अगर विश्व के लोग इस तथ्य को स्वीकार कर लें तो वह दिन दूर नहीं जब पृथ्वीलोक पर स्वर्ग अवतरित हो जाएगा तथा विभिन्न धर्मों के नाम से अवतरित नर्क संसार से हमेशा के लिए विदा हो जायेगा।

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