अनूठा कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम में किसानों को प्रयोगशाला में वैज्ञानिक तकनीक को देखने व समझने का मौका

मऊ। सूक्ष्मजीव टेक्नोलोजी अनुप्रयोग पर प्रायोगिक एवं इंटरैक्टिव कृषक प्रशिक्षण द्वारा ग्रामीण युवाओं में उद्यमिता विकास डीबीटी बायोटेक किसान परियोजना से लाभान्वित हो रहे हैं पूर्वांचल के कई जनपदों के किसान एवं युवा राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव ब्यूरो में ३१ अगस्त २०२१ से पांच दिवसीय कृषक प्रशिक्षण कार्यशाला का शुभारम्भ मऊ जनपद के किसानों को सूक्ष्मजीव आधारित जैविक कृषि के प्रसार और उससे जुड़ी बारीकियों के विषय में व्यापक जागरूकता लाने और खेती, मिट्टी और पर्यावरण के हित में इसे आत्मसात करने हेतु प्रेरित करने के लिए “बायोटेक किसान हब अवस्थापन परियोजना” भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डी.बी.टी.) के द्वारा वित्तपोषित परियोजना को भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद्, भारत सरकार के संस्थान राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव ब्यूरो, मऊ के माध्यम से संचालित किया जा रहा है. इसी के अंतर्गत किसानों के बीच परस्पर संवाद बढाने और उन्हें प्रायोगिक वैज्ञानिक गतिविधियों से परिचित कराने के लिए जनपद और आस पास के बीस किसानों को ब्यूरो की प्रयोगशालाओं में लाया जा रहा है और उन्हें सूक्ष्मजीव आधारित त्वरित कम्पोस्टिंग की प्रक्रियाओं पर 5 दिनों का गहन प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है. ३१ अगस्त २०२१ से प्रारंभ पांच दिवसीय इस कार्यशाला के मुख्य अतिथि एवं ब्यूरो के निदेशक डॉ. अनिल कुमार सक्सेना ने बताया कि किसान के खेतों में मिट्टी के जैविक घटकों का संपोषण आवश्यक है जिससे मिट्टी पोषक तत्वों की सतत चक्रीय प्रणाली का पालन करते हुए फसली पौधों को सम्यक मात्रा में न्यूट्रीएंट और मिनरल तत्वों को उपलब्ध करने में सक्षम हो . देश में फसलों की कटाई एवं मड़ाई के बाद उत्पन्न कृषि अवशेषों को इकठ्ठा कर उनमें सूक्ष्मजीवों का प्रयोग करके गुणवत्तापूर्ण कम्पोस्ट में परिवर्तित किया जाय और फिर इसी कम्पोस्ट का गुणवत्ता उन्नयन लाभकारी सूक्ष्मजीवों के संवर्धन द्वारा किया जाय और उसे खेतों में पुनः उपयोग में लाया जा सके. इस तरह से उत्पादित बायो-फोर्टीफाईड गुणवत्तायुक्त कम्पोस्ट का इस्तेमाल किसान भाई अपने खेतों में करके ना सिर्फ खेती में उत्पादन की लागत को कम कर सकते है बल्कि इस कम्पोस्ट को बेच कर अपनी आय भी बढा सकते है. इस प्रकार किसान भाइयों को कृषि अवशेषों से छुटकारा मिलने के साथ साथ खेतों में कार्बन पदार्थ की मात्रा भी बनी रहती है जिससे पर्यावरण प्रदूषण भी कम होगा . प्रशिक्षणार्थियों को सम्बोधित करते हुए उन्होनें कहा कि किसानों को सूक्ष्मजीव आधारित आधुनिक कृषि तकनीकियों को आत्मसात करना चाहिए जिससे न केवल लागत में कमी लाई जा सके बल्कि मिट्टी के स्वास्थ्य को भी सुरक्षित रखा जा सके. उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था से उपज बढाने से मिट्टी का स्वास्थ्य सुरक्षित रखने में किसानों को सुविधा होगी.
ब्यूरो की प्रधान वैज्ञानिक एवं परियोजना प्रभारी डॉ रेनू ने बताया कि किसानों को खेती की समस्याओं को प्रभावी ढंग से बताने, उनसे विकल्पों के बारे में परस्पर संवाद बढाने, कृषिगत वैज्ञानिक अभिरुचियों को जागृत करने और ‘इंटरैक्टिव लर्निंग’ के माध्यम से किसानों को मिट्टी और पर्यावरण के स्वास्थ्य-रक्षण की विधियों, तकनीकियों और प्रौद्योगिकियों के विषय में प्रशिक्षित करने में इस प्रकार के कार्यक्रमों का महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है. उन्होंने कहा कि इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्रशिक्षुओं को मृदा स्वास्थ्य के रासायनिक और जैविक पहलुओं, मिट्टी से सूक्ष्मजीवों को पृथक करने, कम्पोस्टिंग और फोर्टीफीकेसन तथा सूक्ष्मजीव इनोकुलेंट के उपयोगों पर सम्पूर्ण प्रायोगिक प्रशिक्षण दिया जाएगा. इसके अतिरिक्त इस परियोजना के मूल में किसानों में सूक्ष्मजीवों के कृषिगत अनुप्रयोगों के प्रति अभिरुचि जागृत करना भी है. इस परियोजना की गतिविधियों में चयनित जनपदों (जैसे मऊ, आजमगढ़ और वाराणसी) के अतिरिक्त भारत सरकार के दो आकांक्षी जनपद (सिद्धार्थ नगर और चंदौली) भी शामिल है.
कार्यक्रम के प्रारंभ में प्रधान वैज्ञानिक डॉ. आलोक श्रीवास्तव ने ब्यूरो के क्रियाकलाप एवं किसानों के हित में किये जा रहे प्रयासों के विषय में प्रकाश डाला. कार्यक्रम का सञ्चालन वैज्ञानिक एवं कार्यक्रम समन्वयक श्री ज्योति प्रकाश ने किया. वैज्ञानिक एवं कार्यक्रम समन्वयक डॉ. वी मगेश्वरन ने कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन दिया. कार्यक्रम में ब्यूरो के वैज्ञानिकों के अतिरिक्त अनुसन्धान कर्ता एवं अन्य कर्मचारिगणों ने भाग लिया. इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में मऊ जनपद से १४ गाँव के कुल 20 युवा किसान भाग ले रहे हैं.





