“सुकून”

( किशोर कुमार धनावत)
सुकून क्या है,
एक एकांत पल,
शान्ति के लिए।
अकेलापन,
छिटक जाता है क्यों,
जाने के लिए।
यकीन नहीं,
ये जिंदगी की गाड़ी,
कैसे चलेगी।
पैर रखना,
मुश्किल हो गया है,
यूँ ही निभेगी।
गैर इंसाफी,
उसूल हो गयी है,
जज्बा नहीं है।
इमान अब,
दम तोड़ दिया है,
सब सही है।
इन्सानी रिश्ता,
जलता अलाव है,
हाथ तपाओ।
घोड़े पे चढ़ो,
मंजिल मिलते ही,
उसे भगाओ।
खुला बाजार,
सब पूंजी का खेल,
चाहो सो लेलो।
ये रिवाज तो,
बरसों पुराना है,
सोच को ठेलो।
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१९-८-२०२१

