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बढ़ती महंगाई, डीजल-पेट्रोल के दाम से सरकार, एमएसपी का लेना देना नहीं : अतुल कुमार अनजान

दिल्ली। केंद्र सरकार द्वारा 15 कृषि जिंसों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा के साथ ही सरकार ने इस बात को साफ कर दिया है कि किसानों की जिंदगी को बेहतर बनाने और वर्तमान दौर में जीडीपी में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाले कृषि क्षेत्र को कोई प्राथमिकता नहीं मिलेगी। केंद्र सरकार यह समझती है कि एक चम्मच चीनी भरी नदी में डाल देने से पूरे नदी का पानी मीठा हो जाएगा, तो वह गलतफहमी में है। उक्त प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय महासचिव अतुल कुमार “अनजान” ने केंद्र सरकार द्वारा जारी नीति की आलोचना करते हुए कहा कि स्वयं सरकार के वित्त, सांख्यिकी एवं वाणिज्य विभाग देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति को गंभीर बताते हुए यह कह रहे हैं सिर्फ कृषि क्षेत्र ने ही जीडीपी में योगदान दिया है । इस सच्चाई को स्वीकार करने के बाद भी न्यूनतम समर्थन मूल्य में मात्र 1 से 7 प्रतिशत की मूल्य वृद्धि की गई है । केंद्र सरकार ने विभिन्न अवसरों पर इस बात को स्वीकार किया है कि करोना कॉल सहित अन्य दबावों के कारण भारत मैं गंभीर आर्थिक सुस्ती आई है और उत्पादन लागत दर बढ़ जाने के कारण कारखानों को बंदी का सामना करना पड़ रहा है । निरंतर कृषि लागत दर बढ़ती चली जा रही है । बीज ,खाद,कीटनाशक, बिजली दरों , डीजल, पेट्रोल के निरंतर के दरों ने किसानों को बेकारी और महंगाई के दलदल में धसते हुए खेती करने के लिए मजबूर कर दिया है । सरकारी तेल कंपनियों ने 4 मई से 22 दिनों में वृद्धि कर 5.17 रुपए डीजल और पांच और ₹5.24 पेट्रोल को महंगा कर दिया । कई राज्यों में बिजली मिलती नहीं और किसानों को मजबूर होकर के ₹92 की प्रति लीटर डीजल खरीद कर खेती करनी पड़ती है । डॉक्टर स्वामीनाथन कमीशन कमीशन की सिफारिशों के तहत किसानों को उनके सभी कृषि उत्पाद का C2+ 50 के आधार पर मूल्य दिए जाने का सिद्धांत देने वाले अतुल कुमार “अनजान” ने कहा कि 16 से 18 लाख करोड़ रुपया पिछले 2 वर्षों में उद्योगों को सरकार ने सब्सिडी के रूप में दी । परंतु किसानों को C2+50 के फार्मूले पर उनकी उपज का दाम नहीं दिया l उन्होंने कहा कि की उड़द और तुवर की दाल में ₹300 प्रति क्विंटल की वृद्धि ना से बेहतर है । केंद्र सरकार को यह समझना चाहिए कि देश की जनता के अथक परिश्रम से जो विदेशी मुद्रा अर्जित की जाती है उसमें उसका एक बड़ा भाग खाद्य तेलों और दालों के आयात करने पर केंद्र सरकार व्यय करती है। भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक वनस्पति तेलों के आयात पर 74 हजार 287 करोड रुपए एवं दलहन के आयात पर 11375 करोड़ रुपए वर्ष 2020 -2021 में खर्च किए गए । ऐसी स्थिति में देश को तिलहन और दलहन पर आत्मनिर्भर बनाने के लिए किसानों को प्रोत्साहन के साथ-साथ स्वामीनाथन फार्मूले की बुनियाद पर न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाना समय की मांग है ।

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