रचनाकार

शब्द मसीहा : और भी लोग समझदार हैं

( केदारनाथ शब्द मसीहा )

“अरे! का हुआ ? इत्ता शोर काहे मचा रखा है?” पति ने किताब एक तरफ रखते हुए कहा ।

“इ देख लो जरा पूत को, कहता है डॉक्टरी पढ़ी तो क्रिश्चियन हो जाऊंगा …बाबा जी कह रहे हैं।” पत्नी बोली।

“हम्म …. अब का कहें इनको ? नौजवान हैं …..एक शब्द रट लिया है बस। न हिन्दू होना बढ़िया है, न क्रिश्चियन होना बुरा है। जो चीज बुरी है उसको ये क्या समझेगा। यहाँ भेजो इसे।” पिता ने झल्लाते हुए कहा।

“नहीं पढ़ना है एम बी बी एस में । हमारे पुरातन ज्ञान को वे चूरन -चटनी कहते हैं, और धर्म परिवर्तन कराते हैं , ऐसा बाबा जी ने कहा है।” बेटा बोला।

“वो दो पत्थर से तुम आग जला सकते हो ?” पिता ने पूछा।

“पगला थोड़े ही गए हैं। जब माचिस है तो ….उससे आग जलाएंगे न ।” बेटा तपाक से बोला।

“किसी को च्यवनप्राश का ड्रिप लगा सकते हो ? किसी को दिल का दौरा पड़ा हो तो क्या अश्वगंधा का चूर्ण देकर उसे बचा सकते हो ?” पिता ने पूछा।

“ऐसा नहीं कर सकते , ये तो पागलपन है।”

“अगर पाँचवीं मंजिल पर जाना हो तो क्या दूसरी,तीसरी,चौथी मंजिल से गुजरे बिना जा सकते हो ?”

“यार ! ये तो पागलपन है । ऐसा कैसे हो सकता है ?” बेटे ने कहा।

“वही तो मैं कह रहा हूँ कि ऐसा कैसे हो सकता है। बेटा आयुर्वेद मनुष्य के शरीर को बीमारी से दूर रख सकता है, उसकी जड़ पर काम करता है और धैर्य से शरीर को ठीक करता है। एलोपैथी का ईलाज तुरंत काम करता है। योग, आयुर्वेद अपने आप में महान हैं, सदियों पुराने हैं , मगर होम्योपैथी , एलोपैथी का अपना उपयोग है। तुम अभी नौ-जवान हो, बाबा को देख रहे हो, भविष्य को नहीं। ये किसी धर्म की लड़ाई नहीं है, धर्म को तो ढ़ाल बनाया जा रहा है, उन्हें समर्थक जुटाने हैं, उनका अपना एजेंडा है, व्यापार से जुड़ा हुआ और उनके दल से जुड़ा हुआ । अब बाबा भी कॉर्पोरेट बन गए हैं, नेता बन गए हैं अघोषित। ये कोरपोरेट्स की लड़ाई है। राजीव दीक्षित ने एक अच्छी शुरुआत की थी, उसे भुनाने में बाबा कामयाब हो गए सत्ता का साथ पाकर।” पिता ने समझाया।

“पर लोगों की मौत तो हुई है और डॉक्टर भी मरे हैं। बाबा गलत कहाँ कह रहे हैं?” बेटे ने कहा।

“कितने बाबा और आयुर्वेदाचार्य बीमारी में लोगों का ईलाज कर रहे थे ?” पिता ने पूछा।

“वो कोई फील्ड में तो काम कर नहीं रहे थे, उन्हें मौका ही कहाँ दिया ?” बेटा बोला।

“क्या उन्हें अस्पताल बनाने से रोका था किसी ने ? क्या देश में पंचकर्म और आयुर्वेद के अस्पताल नहीं हैं ?” पिता ने पूछा।

“हाँ, हैं तो सही ।”

“फिर लोग वहाँ क्यों नहीं गए ? क्योंकि एलोपैथ वैज्ञानिक पद्धति है। उनका दुनियाभर में स्थापित तंत्र है। हर बीमारी का वैज्ञानिक अध्ययन मौजूद है। क्या डॉक्टरी के और आयुर्वेद के मेल से देश की सेवा नहीं हो सकती ? दोनों एक-दूसरे के दुश्मन बनकर क्या देश का भला कर रहे हैं ? सैकड़ों डॉक्टर मर गए ईलाज करते हुए, क्या आयुर्वेदाचार्य मरे?”पिता ने पूछा।

“नहीं, आयुर्वेदचार्य तो नहीं मारे गए, क्योंकि वे फील्ड में आए ही नहीं । और काम तो दोनों को करना चाहिए देश के बीमार लोगों के लिए ।” बेटा बोला।

“बिना लड़े क्या कोई शहीद हो सकता है ? उसे बॉर्डर पर जाना होगा, लड़ना होगा। बिजनेस, राजनीति और धर्म का कॉकटेल है ये। तुम्हारा लक्ष्य सेवा है डॉक्टर बनकर , उस पर फोकस करो । क्रेडिट और प्रचार की भूख का अंजाम अभी हमने देखा है। बाबा को प्रूव करने दो । प्रचार में आकार अपना भविष्य खराब करने में बुद्धिमानी नहीं है । हमारे पुरखे तो पुष्पक विमान में उड़ते थे, कहाँ है पुष्पक ? वह भी तो गौरव है हमारा ।” पिता बोले ।

“पर पुष्पक बनाना तो बाबा का काम नहीं है।” बेटा बोला।

“हाँ, ऐसे ही जो बाबा राजनीति और धर्म से खेल रहे हैं वह भी राष्ट्रधर्म नहीं है । राष्ट्रधर्म है लोगों की जान बचाना , उन्हें राहत पहुंचाना , न की समर्थन जुटाकर आयुर्वेद के लिए और अपने बिजनेस के लिए, लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल करना । तुम राजनीति का शिकार हो जाओ ऐसा मैं नहीं चाहता। ये देश सभी का है। उन्हें किसी के धर्म से चिढ़ क्यों है ? क्या किसी के धर्म को निशाना बनाना राजद्रोह नहीं है भारत के संविधान के अनुसार ? ये वाक्पटुता का जाल है। मेरा काम था , तुम्हें समझाना , निर्णय तुम्हारा है , सेवा या धर्म?” पिता ने कहा।

“सॉरी , ऐसे तो मैंने सोचा ही नहीं था । मैं योगा करूंगा और मेडिकल की पढ़ाई भी करूंगा। आयुर्वेद का काम निरोगी रखना है और मेडिकल साइंस का काम हर आदमी को , हर बुरी बीमारी से बचाना । आपने मुझे तो समझा दिया , लेकिन बाकी लोगों को कौन समझाएगा ऐसे ?”

“एक अकेला मैं ही समझदार थोड़े हूँ बेटा, और भी लोग समझदार हैं।”

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