जब एक छोटे से सुझाव से “सुशोभित” की पुस्तक बिकने लगी
किसी लेखक की किताब प्रकाशित हो और वह भी एक नहीं पूरे के पूरे दस और लेखक भी एकदम युवा हो तो, उसे क्या चाहिए। उसके लिए उसके विचार और उसके किताब को पढ़ने वालों की संख्या ज्यादा से ज्यादा हो तो क्या कहने। ऐसे में जब किसी लेखक की किताब अमेज़न पर उपलब्ध है और वहां से अच्छा रिजल्ट ना आ रहा हो ऐसे में कंबो पैक बेचने का एक साधारण व्यक्ति का सुझाव सर्वश्रेष्ठ साबित हो तो सुझाव देने वाले व्यक्ति के प्रति सैल्यूट तो बनता ही बनता है। आइए खुद पढ़ते हैं पूरी बानगी लेखक की जुबानी…
@ सुशोभित
दिनकर पुस्तकालय के मयंक झा ने जब कुछ दिन पहले मुझसे कहा कि वो मेरी दस प्रकाशित पुस्तकों में से नौ का एक कॉम्बो बनाकर बेचना चाहते हैं तो उनकी हिम्मत की दाद देने का मेरा मन हुआ। अलबत्ता मैं आशान्वित नहीं था। कॉम्बो के विचार में निहित संभावनाओं से परिचित भी नहीं था। अमेजन पर मेरी दो या तीन पुस्तकों के कॉम्बो प्रकाशकों ने बनाए अवश्य थे किन्तु उनका प्रदर्शन बहुत उत्साहजनक नहीं था।
नौ किताबों का कॉम्बो लॉन्च करने के कोई डेढ़ महीने बाद जब दिनकर पुस्तकालय ने उमंग और संतोष के साथ मुझे सूचित किया कि हम अभी तक 25 सेट्स बेच चुके हैं तो अब चकित होने की बारी मेरी थी। जब पुस्तकें पाठकों तक पहुंचने लगीं और उन्होंने बड़े चाव से ये सूचना साझा की तो मैं सोचने पर विवश हो गया कि इसका क्या कारण हो सकता था।
हिन्दी के पाठक के लिए यह धारणा मैं मन में बना चुका था कि वह किताब पर पैसा ख़र्च नहीं करना चाहता। कि वह दो सौ रुपए का जलपान कर लेगा और पांच सौ का जूता पहन लेगा पर इतने की किताब नहीं लेगा। जब मैं अपनी पुस्तकें तैयार कर रहा होता हूं तो प्रकाशकों के साथ मिलकर निरंतर इस पर चिन्तन करता हूं कि पुस्तक का मूल्य कैसे कम रहे क्यूंकि मूल्य अधिक हुआ तो पाठक लेगा नहीं। इस भावना के वशीभूत होकर हम पुस्तक की एडिटिंग करते रहते हैं, उसके पेजेस छांटते रहते हैं ताकि अमूमन 160 पेज के पेपरबैक पर औसतन 150 रुपए का सेलेबल फिगर हासिल किया जा सके। कल्पतरु का मूल्य 120 रखने के लिए उसका आकार छोटा किया गया, और अन्तिम दिन जब यह मालूम हुआ कि पुस्तक की पेज संख्या 152 रखने से एक फर्मा और बचाया जा सकता है और मूल्य और कम हो सकता है तो फाइनल कट में से भी तीन चार और चैप्टर्स काटे गए। अभी जिस पुस्तक पर काम कर रहा हूं, उसमें इसी कारण से दस हज़ार शब्द निर्ममता से एडिट कर चुका हूं, भावना वही कि किताब की एमआरपी बढ़ी तो पाठक नहीं लेगा।

वैसे में 1250 रुपयों के कॉम्बो की क्या बिसात! दिनकर के दुस्साहस को मैंने मन ही मन सराहा किन्तु यह चीज़ चलेगी, इसका ख़्वाब में भी गुमान नहीं किया। अब जब डेढ़ महीने में वो दो दर्जन कॉम्बो सेट बेच चुके हैं, और वो भी एक डिप्रेसिव कालखंड में, तो मैं सोचने पर मजबूर हो गया हूं कि पाठक की क्रयशक्ति या इच्छाशक्ति का अनुमान लगा पाने में मुझसे कहां चूक हुई?
क्या इसका कारण यह था कि अमेजन पर ताला लगा है और लोग लॉकडॉउन के कारण घर में थे और अच्छी पुस्तकें पढ़ना चाहते थे? किंतु अमेजन पर मेरा कंप्लीट बुक्स का वैसा कोई कॉम्बो सेट मौजूद नहीं था जिससे दिनकर की प्रतिस्पर्धा होती। वहां इंडिविजुअल टाइटल्स थे और प्रत्येक का पृथक डिलीवरी चार्ज था, 60 से लेकर 80 रुपए तक। 120 या 150 रुपए की पुस्तक पर 80 रुपया शिपिंग चुकाने (एमआरपी का लगभग 50 प्रतिशत!) की उम्मीद पाठक से करना ज्यादती थी, तब भी उन्होंने किताबें ली क्यूंकि कोई और विकल्प नहीं था। प्रश्न यही है कि कोई और विकल्प क्यूं नहीं था? प्रकाशक, वितरक और पाठक के बीच एक बेहतर अंडरस्टैंडिंग क्यों नहीं बनाई जा सकती? अब जब हिन्दी के पाठक में पुस्तक ख़रीदकर पढ़ने की एक नई ललक दिखलाई दे रही है तो किसी ना किसी को फ्री शिपिंग, त्वरित डिलीवरी, 30 से 35 प्रतिशत छूट और पर्सनल रैपो (सीधा फोन सम्पर्क, नियमित फ़ॉलोअप, व्हाट्सएप अपडेट्स) की दिशा में प्रयास करना ही था। जब किसी चीज़ का बाज़ार बनता है तो नए विचार भी उभरते ही हैं, स्टार्टअप्स सामने आते हैं।
जब किसी व्यक्ति को भूख लगती है और वो जेब में पैसा रखकर बाज़ार में निकलता है तो भोजन नहीं मिलने की स्थिति में वो ख़ुद से यह नहीं कहता कि चलो शुक्र है मेरा पैसा बचा! पैसा तो वो खर्चने ही निकला था, भोजन उसे चाहिए। बाज़ार बंद हो गए हों और कोई चतुर उद्यमी उसे घर बैठे फूड पैकेट मुहैय्या करवा दे तो इस विचार को सफल होने में समय नहीं लगेगा। प्रश्न यही है कि भूख कितनी है। मालूम होता है हिन्दी पुस्तकों के लिए पाठकों की भूख अब बढ़ रही है! वैसे में पाठक और पुस्तक के बीच मौजूद वितरण का तंत्र अगर मांग-पूर्ति का सिद्धान्त समझ नहीं पाता तो इसमें सबकी हानि है। ई-कॉमर्स से पहले पुस्तकें दुकानों से बिकती थीं, किताब-मेलों में उठती थीं और सरकारी ख़रीद के ज़रिए लाइब्रेरियों में खपाई जाती थीं। ये तीनों विकल्प आज भी भले और प्रभावी हैं। किंतु ई-कॉमर्स विकल्प को पाठकों के प्रति और सदाशय होने, तथा और आकर्षक प्रस्ताव रखने पर सोचना होगा। अगर इससे अमेजन की मोनोपॉली टूटती है तो वही सही।
और लेखक? उसका तो एक ही धर्म और ध्येय है– अधिक से अधिक पाठकों तक पहुंचना। अपनी पुस्तक को उसकी पूर्ण संभावनाओं तक लेकर जाना। वैसे में हर वो चीज़ जो लेखक-पाठक के बीच व्यवधान है अवांछित है, और हर वो उपाय जो लेखक-पाठक के बीच सेतु बनाता है, स्वागतयोग्य है। इति!

