तुम कहां चल दिए रवीश………
(आनन्द कुमार)
एक ऐसा शख्स जिससे भी मिला मुस्कुराते मिला, मुस्कुराहट जैसे उसे ईश्वरीय देन है। उसका हंसता चेहरा ऐसा लगता था जैसे भगवान ने उसे आशीर्वाद देकर भेजा हो, जा रविश जो भी मिले उसके चेहरों पर खुशियों को लाते रहो और उस शख्स ने खुशियों को बांटा भी खूब, जी भर के, हर किसी को। मैं बात कर रहा हूं मऊ के जाने- माने वस्त्र व्यवसायी व भारत विकास परिषद के पूर्व कोषाध्यक्ष, बहुमुखी प्रतिभा के धनी, हंसमुख रवीश तिवारी का। जो 11 अप्रैल 2021 को कोरोना के कहर से काल के गाल मे समा गए। सरस्वती पुत्र गीत संगीत का प्रेमी सामाजिक सरोकारों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने वाले रवीश के साथ ईश्वर ने जो रचा था वह कर दिया। ईश्वर के फैसले को कोई क्या कह सकता। लेकिन सब ने कहा भगवान रवीश के प्रति इतनी भी जल्दी क्या थी। 11 अप्रैल को भगवान का बुलावा और 14 अप्रैल को रवीश का जन्मदिन कितना अजीब लग रहा है। उन्हें याद करके लोग सिहर उठ रहे हैं, किसी को इस अनहोनी पर भरोसा ही नहीं हो रहा। लेकिन ईश्वर के आगे किसी की ना चली है ना किसी की चलेगी। भगवान को चाहे जो मंजूर हो लेकिन लिखने और पढ़ने के शौकीन रवीश का अपना अलग ही अंदाज था। अपना अलग ही तरीका था। भगवान ने रवीश के प्रति भले ही अपने निर्णय को इस रुप में संजो कर रख लिया हो, की रवीश हम तुम्हें कुछ दिन में अपने पास बुलाने वाले हैं। लेकिन लगता है कि रवीश को भगवान के इस फैसले की भनक लग गई थी। रवीश को यह अंदेशा हो गया था, तभी तो जाते-जाते रवीश अपनी अंतिम रचना में ऐसा कुछ लिख गये की मन व्यथित और आंखें नम् सी हो जा रही हैं। अपनी बोल में, अपनी भाषा में रवीश की लिखी हुई और बोली हुई दोनों रचना है। आज मासूम बेटा अपने पापा को ढूंढ रहा है, उनकी धर्मपत्नी अभी भी बेसुध हैं। परिजनों का हाल बेहाल है। जब तीन साल का बेटा अपने पापा की अंतिम कविता को समझदार होने के बाद पढ़ेगी तो उन्हीं शब्दों में और उनकी अनगिनत रचनाओं में रवीश को ढूढेंगी। लेकिन पापा (रवीश) फिर भी ना मिलेंगे।
14 अप्रैल को रवीश के जन्मदिन पर परिजन उनके इस आखिरी रचना को उनके ही जन्मदिन पर उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप समर्पित कर रहे हैं,।रवीश के लिए इससे अमूल्य कुछ और श्रद्धांजलि नहीं हो सकती।
(रवीश के शब्दों में रवीश)
तुम कहां चल दिए रवीश………
धुंधली रौशनी
उबड़-खाबड़ रास्ते
चिलचिलाती धूप
सुखातीं पश्चिमी हवाएं
इन सबको साथ लेकर
मैं चल पड़ा हूं राह पर
फटे होंठ
बिखरे बाल
निराश आंखें
और सूखते गाल
इन सबको साथ लेकर
मैं चल पड़ा हूं राह पर
बोझिल रिश्ते
अबूझ भाव
चिढ़ातीं भंगिमाएँ
और खंडित प्रतिमाएं
इन सबको साथ लेकर
मैं चल पड़ा हूं राह पर
टूटा दिल
बिखरे जज्बात
अधूरे ख्वाब
और नाकाम हसरत
इन सबको साथ लेकर
मैं चल पड़ा हूं राह पर
ना चांद न चांदनी
न सूरज ना रौशनी
न ख़्वाब न मंजिल
न हसरत न हासिल
न कुछ खोने को
न कुछ पाना था
रास्ते से एक वादा था
और वह वादा निभाना था
उस वादे को साथ लेकर
मैं चल पड़ा हूं राह पर
मैं चल पड़ा हूं राह पर ।।






