रचनाकार

शब्द मसीहा की कहानी : खेल

‘क्या ढूंढ रहे हो ? इस बार तुम्हें हो क्या गया है ? ड्यूटी पर तो पहले भी जाते रहे हो !” मुकेश के बाहुपाश से छूटती हुई शशि बोली .

‘कुछ नहीं हुआ यार ! ये साली ज़िन्दगी खूबसूरत महबूबा की तरह है . हम फौजियों को कभी पता नहीं चलता कि ये कब हमें धोखा दे जाए . खूबसूरत चीजें ज्यादा रूकती भी कहाँ हैं.’ शशि को चूमते हुए बोला.

‘ तो इसलिए जनाब सारा प्यार उड़ेल रहे हैं . और जरा ये बताओ कि ये तुम्हारा प्यार है,,,डर या ताना है मुझे ?’

‘यार! प्यार नहीं होता तो परेशान नहीं होता …और डर है इसलिए कागजात बनवा रहा हूँ तुम्हारे नाम के …ख़ुद को ताना कोई कैसे दे सकता है ?’

‘लगता है जनाब शायर हो गए हैं …इरादा क्या है ?’

‘हम फ़ौजियों का एक ही इरादा होता ….जीत या तिरंगे का कफ़न ……और सब की आँखों में सतरंगियाँ खुशहाल सपने !’

वाकई आँखों में उतरे आंसुओं ने हर मंजर सतरंगिया कर कर दिया था शशि की आँखों के सामने …..आज उसे मुकेश से प्यार के खेल में हारना था ताकि वह देश की जीत केे लिए खुलकर खेल सके .

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