पूरा थाना सस्पेंड
(शब्द मसीहा केदार नाथ)


चौराहे पर चाचा को आए ज्यादा दिन नहीं हुए थे, मगर सब के चहेते बन गए थे । बैटरी रिक्शा चलाते थे और वो भी सत्तर साल की उम्र में । कोई घर बार के बारे में पूछता तो हँसते हुए कहते ….चलाने वाला बहुत बड़ा है । बस मेरी जेब से डायरी के पहले पन्ने पर लिखा फोन कर देना , लावारिश नहीं मरूँगा …हा हा हा ।
कोई ज्यादा पूछता तो बस इतना कहते कि रिक्शा तो कहानियों की तलाश में चलाता हूँ । और पढ़ाने का शौक पूरा करता हूँ । ज़िंदगी सिखाता हूँ …ज़िंदगी।
कुछ ही समय में छोटे-बड़े सब चाचा कहते थे उन्हें । उनकी बातों का असर ऐसा था कि उनके सामने न कोई बीड़ी पीता और न ही गुटखा या तंबाकू खाता । जब भी किसी को ऐसा करते देख लेते तो बड़े प्यार से समझाते थे ,”अरे! पागल क्यों अपने शरीर का नाश करते हो । घर का सहारा हो …मजबूती के लिए इन सब चीजों से दूर रहा करो।”
एक रोज भूरे को तो थप्पड़ ही मार दिया था । भूरा दारू पीकर अपने ऑटो पर बैठा था । जब पता लगा तो गुस्से में उसे थप्पड़ लगा दिया और बोले ,”साला खुद मरेगा और सवारी को भी मारेगा । इसमें क्या बादाम का तेल है जो इसे पीता है ? घर जा के खाली हाथ दिखाएगा तो गाली खाएगा । औरत क्या करेगी, जब घरवाला निकम्मा होगा ऐसा …किसी से नैन-मटक्का करेगी या कलेश करेगी । पड़ोसी मुफ्त की फिल्म देखेंगे …औलाद इज्जत पे मूतेगी । अबे! खुद के लिए नर्क मत बनाओ ।”
यूं तो भूरा किसी की नहीं सुनता था, पर उस रोज चाचा का थप्पड़ भी खा के चुप रह गया था । शायद चाचा के सफ़ेद बालों की वजह से । बाद में भूरा रोया भी था । किसी ने जब पूछा था कि रोता क्यों है? तब भूरे ने कहा था , “अगर कभी मेरे बाप ने ऐसे डांट लगा दी होती तो मैं बर्बाद न होता।”
चाचा अक्सर दस -ग्यारह बजे आकर खड़े होते थे और पाँच बजे वापिस भी चले जाते । अक्सर कहते थे कि अकेले पेट लायक काफी हो जाता है । जोड़कर क्या साथ ले जाऊंगा पैसा ।
कई बार बुजुर्ग और बच्चों से पैसा भी नहीं लेते थे । बस एक ही बुरी आदत थी , हरएक से ऐसे बात करते जैसे कि सालों से नहीं सदियों से जानते हों । लड़कियां तो जैसे उन्हें अपना दादा ही मानती थीं । कई बार तो खड़े रहकर उनका इंतजार करतीं कि जाएँगे तो दादा के रिक्शे में ही जाएँगे । दादा से बाकी ड्राइवर मन ही मन चिढ़ते भी थे कि बूढ़ा बहार को अपनी गाड़ी में ले जाता है।
उस रोज सभी परेशान थे । उगाही चंद फिर लौट आया था उस इलाके में । हर एक से सौ रुपये हफ्ता लेता था । अगर नहीं देते तो कभी गाड़ी पे लट्ठ चलता और कभी शीशा या लाइट तोड़ देता । पुलिस के नाम पर सरकारी गुंडा था । सब डरते थे और गालियां भी देते थे, मगर सरकारी सांड से उलझे भी तो कौन ! सारा महकमा तो घूसखोरों से भरा हुआ है । पुलिस की असली हकीकत जाननी हो तो ड्राइवरों से किस्से सुनो इनके ।
जैसे ही चाचा ने अपनी गाड़ी लगाई तो मोहित ने कहा ,”चाचा ! सौ का नोट तैयार रखो । बसूली वर्दी आती होगी। शुक्रवार को उसका बसूली का दिन है । चुपचाप दे देना सौ रुपये ।”
“क्यों भाई , हराम का माल है क्या ? मैं तो नहीं दूँगा ।”
“चाचा ! बेकार में गाड़ी तोड़ देगा या हाथ उठा देगा आप पर । दे देना , नहीं तो मैं दे दूँगा तुम्हारे , पर उस से उलझना मत।”
“अच्छा बेटा , दारू छोड़ दी तो ऐसे पैसे लुटाएगा । मैं कौन लगता हूँ वे ? और उस से इतना क्यों डरते हो ? आने दो आज उसे मैं देखता हूँ ।” और चाचा मुस्कुराते हुए अपनी गाड़ी को कपड़ा मारने लगे ।
थोड़ी देर बाद गाड़ी पर ठक- ठक की आवाज हुई । चाचा ने देखा तो बोले -“अभी रिक्शा खाली नहीं है । बच्चियाँ आती होंगी उन्हें छोडने जाना है।”
“अबे! हफ्ता निकाल । मुझे कहीं नहीं जाना।” पुलिसवाला बोला ।
“हफ्ता तो मेरा भी मुश्किल से निकलता है भाई । पाँच-छह घंटे काम करता हूँ तो दो-तीन सौ बनते हैं ।” चाचा बोले ।
“अबे! यहाँ खड़े होने का टैक्स दे …नहीं तो अभी अंदर कर दूँगा गाड़ी । लगता है नया आया है ।” और उसने डंडा उठा लिया ।
“रुको ! गाड़ी ने क्या बिगाड़ा है ? तनख्वाह मिलती है , उससे गुजारा नहीं होता तो कोई और काम करो ।” चाचा बेखौफ बोले थे ।
“साले ! तुझे बताया नहीं किसी ने ….यहाँ सब मेरे कहने से चलता है। निकाल सौ रुपये ।” वह गुर्राया था ।
चाचा ने जेब में हाथ डाला और मोबाइल निकाल लिया ।
“फोटो खींचेगा …वीडियो बनाएगा मेरी ।” और चीखते हुए उनका मोबाइल हाथ से छीनकर जमीन पर दे मारा ।
“साब ! रुको , मैं देता हूँ चाचा के पैसे । आप इनको कुछ मत कहो। ” और सौ का पत्ता उसके हाथ में थमा दिया सुमेर ने । पुलिसवाला आगे चला गया । सुमेर ने फोन उठाया । उसकी बैटरी लगाई और चाचा को थमा दिया ।
“चाचा ! ये दुनिया ऐसे ही चलती । क्यों बूढ़ी हड्डियों के साथ इन सरकारी गुंडों से पंगा लेते हो ?”
चाचा ने जेब में हाथ डाला और सुमेर को सौ रुपये पकड़ाते हुए बोले , “ये ले अपने पैसे । और इन कुत्तों की हिम्मत को हम ही बढ़ाते हैं । इसने गलत आदमी से पंगा ले लिया । अब इसका बाप इस मोबाइल को ठीक करवा के देगा । ये ले मेरी डायरी , अगर मैं एक -डेढ़ घंटे में न लौटूँ तो इसके पहले पन्ने पे लिखा नंबर लगा के बता देना कि मैं थाने में हूँ ।”
चाचा ने अपनी रिक्शा को थाने की तरफ दौड़ा दिया । सुमेर पीछे से चिल्लाता रह गया कि वहाँ जाने से कुछ नहीं होगा । मगर चाचा तो निकल चुके थे ।
रिक्शा थाने के बगल में खड़ा कर के अंदर गए और एसएचओ का कमरा पूछा । सिपाही ने तंबाकू रगड़ते हुए एक तरफ इशारा कर दिया । चाचा उस दिशा में बढ़ गए ।
“साहब! अंदर आ जाऊँ?” कमरे का दरवाजा खोलते हुए पूछा ।
“आजा बाबा , क्या कहना है बता ?”
“मेरे मोबाइल को आपके थाने के वसूलीराम ने तोड़ा है और मेरे साथियों से नाजायज वसूली की है । मुझे मेरे सौ रुपये वापिस चाहिएँ और इस मोबाइल को ठीक करवाने का खर्चा भी । आप कहें तो मैं लिख के भी दे सकता हूँ।” चाचा पूरे आत्मविश्वास से बोले ।
“हा हा हा ….वाह बाबा ! कमाल कर दिया तूने ….पुलिस से पैसे मांग रहा है ? अगर नहीं दिये तो क्या करेगा ?”
“फिर ज्यादा देने पड़ेंगे ।”
“तू क्या कोई नेता है ? तुझे पहले तो कभी नहीं देखा । किसी दूसरी दुनिया से टपका है क्या ?” एसएचओ ज़ोर से हंसा जैसे उसने किसी जोकर को देखा हो ।
“अगर पैसे नहीं देने तो मेरे लिए चाय मँगवा लो। एक घंटे का टाइम तो है मेरे पास । आराम से बात करते हैं ।” चाचा बोले ।
“हा हा हा ….भांग पी है क्या ? पुलिस स्टेशन है …कोई ढाबा नहीं है । जाओ यहाँ से ।”
“कहा न साहब , एक घंटा है मेरे पास । वसूली राम को बुला लो नहीं तो अच्छा नहीं होगा ।” चाचा ने अपनी बात को ज़ोर देते हुए कहा ।
“अबे! सौ रुपये के लिए इतना वबाल मचा रहा है , बोल तो ऐसे रहा है जैसे कलेक्टर का बाप हो । वसूलीराम साहब का आदमी है । कोई नहीं सुनेगा । जा और मेरा वक्त बर्बाद मत कर ।” पानी का गिलास उठाकर पानी पीते हुए एसएचओ बोला ।
“किसका बाप हूँ , ये तो एक घंटे बाद पता चलेगा । ठीक है , एक गिलास पानी ही पिला दो भाई ।” चाचा बोले ।
“ओ सतवीर ! इसे बाहर ले के जा ….और इस पर पूरा मटका उड़ेल दे । बहुत प्यासा है । लगता है पागलखाने से छूटकर आया है।”
“माइंड योअर लेंग्वेज मिस्टर । आई एम सिटीजन ऑफ इंडिया । आई एम नॉट ए बैगर । यू आर मिस्विहेविंग विद मी ।” चाचा ने अपनी बात ज़ोर से कही तो सिपाही ठिठक गया ।
“हा हा हा ….अङ्ग्रेज़ी झाड के रौब दिखा रहा है ? अबे बहुत आते हैं यहाँ । धमकी दे रहा है …बैठा इसे ….और एक नहीं चार घंटे बैठा । देखता हूँ कौन-सी तोप है ये ।” एसएचओ आग बबूला सा बोला ।
सिपाही चाचा का हाथ खींचता हुआ बाहर ले गया ।
कुछ देर बाद एसएचओ का फोन बजा ।
“हैलो !”
” जी साहब ।” बजरंगी ने खड़े होकर सेल्यूट किया।
“मैं आ रहा हूँ । मेन चौराहे के बीट इंजार्च को हाजिर रखना। ” और फोन कट गया ।
बजरंगी पसीने-पसीने हो गया । नए डीएसपी का फोन था । सुना था बहुत कडक और ईमानदार है । आनन-फानन में सब को अलर्ट रहने को कहा और वसूलीराम को थाने आने को कहा ।
अब एसएचओ के दिमाग की घंटी बजी और उसे बूढ़े चाचा का ख्याल आया ।
“अबे! उस बूढ़े को कहीं छिपाओ या भगा दो यहाँ से , कहीं सामने पड़ गया तो लेने के देने पड़ जाएँगे ।” एसएचओ ने आदेश दिया । सिपाही चाचा की तरफ लपके । चाचा आराम से बैठे हुए थे ।
“ओए बाबा ! हमारे बड़े साहब आने वाले हैं । जाओ यहाँ से ।” सिपाही बोले।
“बड़े साहब से मिल के जाऊंगा भाई । तुम्हारे साहब ने तो कुछ किया नहीं , शायद बड़ा साहब सुन ले ।” चाचा बोले ।
“अरे! चल यहाँ से । बड़ा आया, बड़े साहब से मिलने वाला ।” सिपाही बोला ।
“हा हा हा ….मारोगे मुझे ? अब मिल के ही जाऊंगा।” चाचा भी अड़ गए थे ।
एक भारी-भरकम पुलिसवाला आगे बढ़ा और चाचा को लगभग घसीटते हुए गाड़ी में डालने लगा । तभी डीएसपी साहब की गाड़ी ने भी प्रवेश किया थाने में । चाचा अपना हाथ छुड़ाकर खड़े हो गए । गाड़ी आगे जाकर रुकी । डीएसपी बाहर निकले और इधर-उधर देखने लगे ।
“साहब ! मैं यहाँ हूँ ।” चाचा ने चिल्लाकर कहा ।
डीएसपी तुरन्त उधर की ओर पलटे और आगे बढ़े । सब हैरान और सतर्क खड़े थे । डीएसपी ने अपनी कैप उतारी और बुजुर्ग के पैर छूए ।
“आइये , अंदर चलते हैं ।” उन्होने चाचा का हाथ पकड़ा और मुस्कुराते हुए एसएचओ के कमरे की तरफ बढ़े । वह अपनी सीट से खड़ा हुआ और उन्हे कडक सेल्यूट किया । लेकिन चाचा को साथ देख उसकी सिट्टी-पिटटी गुम हो गई ।
“बैठिए ।” डीएसपी ने चाचा को कहा। और वह कुर्सी पर बैठ गए ।
“क्या चल रहा है ? ये यहाँ कैसे आए ?” एसएचओ से पूछा।
“कुछ नहीं सर , मैं इनकी कंपलेंट लिख ही रहा था ।” एसएचओ बोला ।
“हा हा हा …. पापा ! ये सही कह रहे हैं ?” डीएसपी ने पूछा ।
अब एसएचओ को जैसे गश ही आ गया ।
“मैं देता हूँ आपको पानी एसएचओ साहब । शर्म आनी चाहिए हम लोगों को । आप लोगों ने वर्दी को बेच डाला है। आपकी सारी रिपोर्ट मेरे पास आ चुकी है । गुंडों को भी शर्म आती है किसी बुजुर्ग पर हाथ उठाते, और आप सब मिलकर यहाँ सरकारी गिरोह चला रहे हैं ।” डीएसपी गुस्से में बोले ।
“रहने दो बेटा ……मैं हूँ न । अभी और भी कई काम हैं । आज की कहानी मिल गई…. क्लाइमेक्स में क्या लिखूँ ?” चाचा ने मुस्कुराते हुए पूछा ।
“पूरा थाना सस्पेंड।”
“हा हा हा …जौली गुड ।” एक तारीख को आऊँगा पोते के जन्म दिन पर । और चाचा हँसते हुए बाहर निकल गए ।

