खास-मेहमानचर्चा में

एक देश एक चुनाव कहाँ तक संभव

( शालिनी श्रीवास्तव )

मोदी सरकार दुबारा सत्ता पर काबिज होते ही सबसे पहले एक देश एक चुनाव के मुद्दे को लेकर सामने आ गयी है। इससे पहले भी चुनाव आयोग, नीति आयोग, विधि आयोग से लेकर राष्ट्रपति तक अपने अभिभाषण में इसकी चर्चा कर चुके है। हालांकि इस मुद्दे पर सबसे पहले जिक्र 2002 में वेंकेचरलैया समिति ने किया था।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और यहाँ का चुनाव किसी राष्ट्रीय पर्व की तरह ही है। इतने विशाल जनसंख्या वाले देश में प्रतिवर्ष किसी न किसी राज्य में चुनाव होते ही रहते है। ऐसे में निष्पक्ष तथा स्वस्थ चुनाव कराना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। शायद इसी के मद्देनजर स्थायी संसदीय समिति ने चुनाव को एक साथ ना कराकर दो चरणों में संपन्न कराने का सुझाव दिया था । जिसके पहले चरण में लोकसभा की मध्यावधि में आधी विधानसभाओं के चुनाव और बाक़ी बची विधानसभाओं का चुनाव लोकसभा के साथ संपन्न करा लेने का सुझाव पेश किया था। विधि आयोग ने भी अपनी 170वीं रिपोर्ट में यह कहा कि जिन विधानसभाओं के कार्यकाल आम चुनाव के 6 महीने बाद ख़त्म होने वाले हों उनका चुनाव आम चुनाव के साथ करा लिया जाय। इससे पहले भी 1952, 1957, 1962 और 1967 में आम चुनाव एक साथ सम्पन्न हुआ है। बाद में यह क्रम विधानसभाओं के पहले भंग होने के कारण टुटा और अब फिर से चुनाव एक साथ कराने का मुद्दा जोर पकड़ने लगा है।
नीति आयोग के सुझाव को माने तो उसने भी 2024 में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ करवाने का विचार प्रस्तुत किया है। चुनाव आयोग ने भी इस बात पर अपनी सहमति जता दी है । चुनावों की बारंबारता और निरंतरता के कारण भारत हमेशा इलेक्शन मोड में ही रहता है, जिससे बार-बार आदर्श आचार संहिता लगाना पड़ता है जिससे सरकार इस बीच ना तो कोई नीतिगत निर्णय ले पाती है और ना ही योजनाएं ही निर्बाध रूप से सुचारू करा पाती है । इससे विकास प्रभावित होता है । यदि देश में एक साथ चुनाव सम्पन्न करा लिया जाए तो इससे अधिकतम 2 महीने आदर्श आचार संहिता लगानी पड़ेगी बाकि के 4 साल 10 महीने विकासात्मक कार्य निर्बाध रूप से संचालित किए जा सकते है । इससे खर्च में कमी आएगी एवं राष्ट्रिय कोष में वृद्धि होगी और कालेधन तथा भ्रष्टाचार पर लगाम कसने में मदद मिलेगी ।
चुनाव कराने में सरकारी सेवकों, शिक्षकों आदि की सेवा से जो मूल कार्य प्रभावित होता है वह भी प्रभावित होने से रूकेगा साथ ही पुलिस एवं सुरक्षा बलों की भी सहायता बार बार नहीं लेनी पड़ेगी। बार बार होने वाली चुनावी रैलियों से होने वाली परेशानियों से भी लोगों को मुक्ति मिलेगी। इन सब अच्छाइयों के बावजूद अभी एक साथ चुनाव करना,व्यवहारिकता की दृष्टि से बहुत दूर है। यह संघीय ढांचे के विरूद्ध है क्योंकि एक साथ चुनाव कराने के लिये बहुत सी विधानसभाओं के कार्यकाल को घटाना या बढ़ाना पड़ेगा, जिससे राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित होगी। साथ ही इसके लिए संविधान में आवश्यक संसोधन की आवश्यकता पड़ेगी। संविधान के कई अनुच्छेद एक साथ चुनाव कराने के बिल्कुल विपरीत है । मसलन अनुच्छेद 85 (2) (ख) के अनुसार राष्ट्रपति लोकसभा की और अनुच्छेद 174 (2) (ख) के तहत राज्यपाल विधनसभा को 5 वर्षो से पूर्व भंग कर सकते है। अनुच्छेद 356 राष्ट्रपति शासन की बात करता है जहाँ अप्रत्याशित उल्टफेर पर दुबारा चुनाव की संभावना बढ़ जाती है । अनुच्छेद 352 के तहत युद्ध ,बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विरोध की स्थिति में राष्ट्रीय आपातकाल लगाकर लोकसभा का कार्यकाल बढ़ाया जा सकता है। अनुच्छेद 2 जहाँ नए राज्यो को भारतीय संघ में शामिल करने की बात करता है वहीं अनुच्छेद 3 के द्वारा कोई नया राज्य बनाया जा सकता है जहाँ अलग से चुनाव कराने की आवश्यकता हो सकती है। ऐसी स्तिथि में एक साथ चुनाव कराने के लिए इन सभी अनुच्छेदों में आवश्यक संसोधन करने की जरुरत पड़ेगी जो इतनी जल्दी संभव नहीं है। इस मुद्दे के विरोध में एक और बात सामने आती है कि इससे क्षेत्रीय मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दे के आगे गौण हो सकती है या परिस्थिति इसके विपरीत हो सकती है। बहरहाल, एक साथ चुनाव कराने से लगभग 2 महीने तक वास्तविक लोकतंत्र निलंबित हो जायेगा क्योंकि इस बीच चुनाव आयोग ताकतवर हो जायेगा और उसके निरंकुश होने की संभावना बनी रहेगी। साथ ही राजनितिक शून्यता की स्थिति होने से देश विरोधी ताकतें हावी हो सकती है । जिसका फायदा शत्रु देश उठा सकते है। अतः एक देश एक चुनाव का विचार व्यवहारिकता की धरातल पर सटीक नही उतरती है। यह एक लंबी प्रक्रिया है जिसे आनन् फानन में लागू नहीं किया जा सकता।

फिलहाल देश की सभी विधानसभाओं का लोकसभा के समय के साथ तालमेल बैठाना मुश्किल है। चुनाव आयोग का मानना है कि 2014 के चुनाव 9 चरणों में पूरा हुआ था जिसमें सवा लाख केंद्रीय रिजर्व बलों की तैनाती की गयी थी ऐसे में एक साथ 29 राज्यों और 2 केंद्रशासित प्रदेशों में चुनाव कराने का क्या मंजर होगा यह सोचा जा सकता है। एक साथ चुनाव कराने के लिये लगभग 42 लाख ईवीएम की जरुरत पड़ेगी जो आयोग के पास नहीं है। और ना ही इतनी मात्रा में चुनाव कराने में सक्षम एवं प्रशिक्षित एजेंट ही है जिन्हें ड्यूटी पर लगाया जा सकता है।
एक साथ चुनाव कराने से पहले चुनावी सुधारों पर ध्यान देना ज्यादा जरुरी है। राजनितिक अपराधीकरण पर सख्त कानून, कालाधन पर रोक, जनप्रतिनिधि कानून को अद्यतन करना, राजनितिक जागरूकता लाने की ज्यादा जरुरत है। तभी चुनावी प्रक्रिया लोकतान्त्रिक रूप में आगे बढ़ती रहेगी। वरना आजकल राजनेता सिर्फ राजपाट पाने को आतुर दिखते है ऐसे में चुनावी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
यदि भूतकाल को देखते हुए देश में एक साथ चुनाव करा दिया जाये तब भी हमे नहीं भूलना चाहिए की तब और अब की स्थिति में फर्क है। आज जनसँख्या ज्यादा है और तब एक आज़ादि की एक आदर्शमय स्थिति थी और एक विशेष पार्टी का वर्चश्व था जो आगे चलकर कमजोर हुआ और एक साथ चुनाव कराने की प्रक्रिया बाधित हुई । अब भी यह जरुरी नहीं एक साथ चुनाव कराने का यह क्रम आगे बरकरार रहेगा। अतः जरुरी है कि इस विषय पर व्यापक विमर्श हो तथा विकल्प के तौर पर इसे दो खेमो में कराकर देखा जाये और इसका आँकलन करके ही आगे आजमाया जाए।

लेखिका शालिनी श्रीवास्तव, केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लख़नऊ में पूर्व रिसर्च एसोसिएट रही हैं एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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