मासूमों की मौत से उठते सवाल !
(अवनिन्द्र कुमार सिंह)
एक बार फिर दिमागी बुखार की चपेट में आने से मासूमों के मौत की खबरें आ रही है। पिछले दस दिनों में मुजफ्फरपुर अस्पताल में भर्ती बच्चों में से सौ के ऊपर बच्चों ने दम तोड़ दिया है। मरने वाले बच्चों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है और चिकित्सक इसे रोक पाने में नाकाम साबित रहे है। यह तस्वीर बिहार सरकार की संवेदनहीनता और घोर लापरवाही को दर्शाता है। चिंता का विषय यह है कि पिछले दस दिनों में चिकित्सक इस बीमारी के कारण का पता तक नहीं लगा सके है। राज्य के करीब एक दर्जन जिले इस बीमारी के चपेट में है। इस बीमारी को जापानी बुखार भी कहते है। प्रत्येक वर्ष पूर्वी यूपी और बिहार इस बीमारी के चपेट में आता है और मासूमों की जिंदगी को लील जाता है। बाबजूद इसके इस बीमारी से निपटने के संसाधन पर्याप्त नहीं है।
मुजफ्फरपुर अस्पताल में करीब ढाई सौ बच्चे भर्ती है। अधिकांश बच्चे ग्रामीण इलाके के है। बच्चों के मौत का सिलसिला काफी दिनों से चल रहा था लेकिन इस बार मौत का जो आंकड़ा बढ़ा है वह राज्य सरकार की लापरवाही का ही प्रमाण है। लगातार पीड़ितों के अभिभावकों का आरोप है कि उन्हें बेहतर इलाज नहीं मिल रहा, दवाओं का आभाव है। उन्हें सुनने के बाद यह प्रतीत होता है कि बच्चों के मौत की संख्या बुखार से कम सरकार के भ्रष्ट और लाचार तंत्र की वजह से ज्यादा बढ़ी है। अब सवाल यह कि जब यह बीमारी प्रत्येक वर्ष फैलती है तो इसके लिए कोई ठोस उपाय क्यों नहीं किए गए? हैरतअंगेज है कि जापानी बुखार के फैले प्रकोपों का जायजा लेने बिहार पहुंची केंद्रीय टीम ने स्पष्ट किया कि इस बीमारी से निपटने के लिए ट्रामा सेंटर, सघन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू), विशेषज्ञ चिकित्सक और नर्सों का अभाव है। इससे साफ है कि स्वास्थ्य पर खर्च होने वाला कोष ईमानदारी से खर्च नही किए जा रहे, यदि ऐसा होता तो जिन अस्पतालों पर लोगों को स्वस्थ रखने की जिम्मेदारी है वह खुद भ्रष्टाचार से संक्रमित न रहते।
सरकारी अस्पताल में मरीजों को मिलने वाली सुविधाएं अक्सर ही कटघरे में रहती है। राज्य सरकार से मिलने वाली भारी-भरकम बजट के बाबजूद भी सुविधाविहीन ही नजर आते है। जरुरत के मुताबिक जहा न तो विस्तर है और न ही जाँच मशीन, जहा है भी वहा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा हुआ है। यही सूरत लगभग सभी राज्यों के जिला अस्पतालों की है। 1977 में पहली बार बिहार में इस बीमारी के मरीज पाए गए तब से अब तक लगभग 1 लाख से ज्यादा बच्चों ने अपनी जान गवां बैठी। पिछले वर्ष गोरखपुर में हुई बेतहाशा बच्चों की मौत से मचे हाहाकार ने सरकार की जमकर किरकिरी कराई। मगर सवाल वही की आखिर चार दशकों बाद भी हम इस बीमारी से निपटने के कारगर इलाज नहीं खोज पाए और राज्य के मासूम मौत के नींद सोने को मजबूर है।
लेखक अवनिन्द्र कुमार सिंह
भदैनी मिरर के संपादक हैं
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