शब्द मसीहा की कहानी: इस्तेमालवाद
एक फेसबुक मित्र ने मुझे अमित्र कर दिया । वैसे तो ख्याल नहीं जाता है कि कौन जुड़ा और किसने छोड़ा पर तब टेग करने लगा तो दिखाई नहीं दिये । मैंने फोन किया और पूछा –
“कैसे हैं भाई साहब ? क्या हुआ जो आपने अमित्र कर दिया ?” पहले तो वे सकुचाये और फिर धीरे से बोले –
“भाई साहब ! वो आप कुछ ज्यादा ही अलग तरह के विचार रखते हैं । आप राष्ट्रवादी विचारधारा के नहीं हैं । आप हमारे पक्ष से जुड़ी कोई बात नहीं कहते और अक्सर लगता है कि आपकी कहानियों में जैसे हमारा ही विरोध होता है।”
“हा हा हा …. बस इतनी -सी बात है । वैसे क्या मैं राष्ट्र विरोधी लिखता हूँ ? कोई एक पोस्ट बताइये मुझे ।” मैंने जिज्ञाषावश पूछा ।
” ऐसा तो नहीं , पर आप हमारा साथ नहीं देते हैं । हमें अच्छा नहीं लगता ।”
‘हम्म… वैसे राष्ट्रवाद तेरा या मेरा नहीं होता । मैं राष्ट्रवाद की सही परिभाषा जानता हूँ ।”
“उससे हमें क्या मतलब भाई जी …..हम तो अपने नेता जी का राष्ट्रवाद फॉलो करते हैं । ”
मैंने तुरंत फोन काट दिया। दोबारा उनका फोन नहीं आया और मैं इस बात से भयभीत हूँ कि नेताओं ने कौन-सा नया राष्ट्रवाद खोजा है अलबत्ता मैं तो इस्तेमालवाद को ज्यादा देखता हूँ।
शब्द मसीहा

