राम अगर तुम समझे मुझको, खुद को राम समझना
मेरी कलम से…
आनन्द कुमार
मन- मन में हूँ
कण कण में हूँ
हाँ, मैं श्रीराम हूँ
नभ, थल में हूं,
वायु, जल, सर्वत्र में हूं,
हां मैं श्रीराम हूं,
मैं अयोध्या में हूं,
मैं विश्व के हर क्षण में हूं।
अपनी मातृभूमि पर,
मेरी जन्मभूमि का,
श्रृंगार कर रहे हो तुम,
श्रद्धा, सुमन व विश्वास का,
मंदिर निर्माण कर रहे हो तुम।
बिल्कुल करो तुम,
जो करना चाहो,
पर मेरे आदर्शों का,
ख्याल भी तुम रखना,
खुद “राम” बनकर,
मां, बाप, भाई, बहन,
पत्नी, बेटा व बेटी सहित,
मित्र, पड़ोसी हर रिश्तों का,
मान तुम रखना।
सबको “राम” समझना,
सब में “राम” देखना।
चाहे जयकारा, जितना लगा लेना,
मेरे नाम का,
चाहे शीष जितना झुका लेना,
मन किसी का ना झुकने देना,
दिल किसी का ना दुखने देना।
मुझे मालूम है,
तुम असंख्य हो,
और मैं एक हूं,
पर मैं सबमें हूं,
और सब मुझमें हैं।
और हां,
अगर अयोध्या आना तो,
मन कटुता से भर मत आना,
लोभ, छल और माया को,
साथ कभी तुम, मत लाना,
धर्म किसी का अहित न हो,
काम तुम ऐसा करना,
“राम” अगर समझते तुम मुझको,
अन्याय कभी मत करना,
चन्द पैसों की खातिर तुम,
ईमान कभी ना बेचना,
“राम” अगर तुम समझे मुझको,
खुद को “राम” समझना,
मेरे आदर्शों को,
खुद में पल्लवित पुष्कित करना।


