प्यार बेचता नहीं हूँ
(शब्द मसीहा केदारनाथ)
‘अरे ! साहब ये क्या हुआ ? आप आफिस साइकिल से आये हैं !’ चपरासी ने अपनी साइकिल खड़े करते हुए कहा .
‘क्यों भाई ! मैं क्या कार की जगह साइकिल नहीं चला सकता ? अमीर होने का मतलब बेबकूफ होने की आजादी तो नहीं है !’
‘समझा नहीं साहब !’
‘भाई ! रोज कार से जिम जाकर मैं साइकिल चलाता था ताकि सेहत ठीक रहे मेरी. अब साइकिल से आऊंगा तो सेहत भी ठीक रहेगी और पर्यावरण भी . साथ ही पैसे भी बचेंगे जो किसी और काम आयेंगे . तुम्हे गाडी साफ़ करने की भी जरुरत नहीं …..अगर मैं थोडा सा नीचे उतरकर अपनी सेहत और पैसा बचा सकता हूँ तो बुराई क्या है .’
‘वाह साहेब ! मैं यूँ ही अपनी गरीबी को कोसता कि साइकिल नसीब हुई है मुझे . आज से आप भी साइकिल पे तो लगता है कि मैं गलत था .सामान जरुरत का ही रखना चाहिए.’
‘आज से चाय बंद तुम मेरे लिए भी सत्तू लेकर आओगे !’
‘साहब ! मेरी खुशकिस्मती है. कल ही माँ ने भेजा है सत्तू अपने हाथ का पीसकर .’
‘ये लो ! कल थोडा सा मेरे लिए भी लाना .’ पैसे पकडाते हुए उसके साहब ने कहा .
‘साहब ! गरीब हूँ पर अपनी माँ का प्यार बेचता नहीं हूँ .’

