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भासपा व भाजपा मंत्री के बहके बोल कब तक, क्यों चुप हैं वरिष्ठ

(आनन्द कुमार)
मऊ। राजनीति में पक्ष-विपक्ष का आरोप-प्रत्यारोप का खेल और बातें तो आप लंबे समय से देखते और सुनते आ रहे होंगे, लेकिन एक ही सरकार में रहकर गठबंधन धर्म निभाते हुए एक दूसरे का विरोध करने का कुछ ज्यादा खेल अगर किसी पार्टी में चल रहा है तो, वह पार्टी वर्तमान में उत्तर प्रदेश में शासन कर रही भारतीय जनता पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी है। 

सरकार में दोनों सहयोगी दल भाजपा व सुभासपा के मंत्री पर आरोप प्रत्यारोप के ऐसे प्रसंग सामने आ रहे हैं जो काफी चौकाने वाले वह हास्यस्पद से लगते हैं। अब ऐसे में जनता किसकी बातें सच माने किसकी बातें झूठ। यह समझना थोड़ी मुश्किल है, हम बात कर रहे हैं यहाँ उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री और सहयोगी दल के रूप में गलबहियां कर रहे हैं सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के मुखिया ओमप्रकाश राजभर  व भाजपा में राज्य मंत्री अनिल राजभर की। दोनों नेता जब भी मीडिया के सामने आते हैं तो एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करने में जरा सी भी चूक नहीं करते और अगर दूसरे मंत्री की बात व बयान से रुबरु अगर किसी पत्रकार ने करा दिया तो फिर क्या सोने पर सुहागा।

हुआ भी यही बुधवार को सुभासपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर मऊ आए हुए थे। इस दौरान बात ही बात में पत्रकारों ने उनसे जब पूछा कि आपके ही पार्टी के आपके सहयोगी दल के मंत्री आपके बारे में काफी विवादित बयान देते हैं, तो उन्होंने पलटवार उनके जवाब में कहा कि अनिल राजभर समाज का छोटा बच्चा है अभी, नासमझ है, समझ जाएगा।

श्री राजभर ने कहा कि हमारे समझ से अनिल राजभर परिवार का बच्चा है, गलती कर रहा है, समझा लिया जायेगा। जबकि इससे पहले भी कई बार दोनों मंत्रियों के बीच आरोप प्रत्यारोप का जुबानी जंग चलती रहती है। दरअसल इस जुबानी जंग का मूल कारण तो राजभर समाज में कौन कितना घुसपैठ रखता है। यह भी हो सकता है, लेकिन क्या यह जुबानी जंग साथ-साथ गठबंधन की सरकार में चलने से दलों की छवि धूमिल नहीं कर रहा है। सच क्या है यह तो भविष्य के गर्त में है। बहरहाल ऐसी बयानबाजी से सरकार की किरकिरी के अलावा कुछ नहीं हो रहा है। क्यों नहीं भाजपा ऐसे मामले का पहल कर कोई रास्ता निकाल रही है कि इन दोनों नेताओं का जुबानी जंग बंद हो,ताकि यूपी सरकार की छवि बनी रहे।

मामला चाहे जो भी हो बड़े नेताओ की चुप्पी और पहल ना करना कहीं रिश्तों में दरार ना ला दे इस बात को भी ध्यान में रखना होगा।ऐसी बयानबाजी के पीछे कोई मकसद या खेल तो नहीं। फिलहाल ऐसे बयान भाजपा जैसी पार्टी के लिए कई मायने रखते हैं। सोचना होगा कि सुभासपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर को आखिर क्यों बोलना पड़ा, अनिल राजभर अभी बच्चा है, उसे समझा लिया जाएगा।

वक्त रहते दोनों नेताओं के आपसी बोल पर अगर विराम नहीं लगता है तो यह तय हैं कि समाचार की सुर्खियां तो भले ही पत्रकारों को मिल जाये, लेकिन छवि तो जनता जनार्दन के बीच केवल सरकार की ही खराब होगी। बस इतना ही कहूंगा कि “सफर है लम्बा साथ भी चलना है, रास्ते हैं टेढ़े कांटे भी बहुत हैं, दुश्मन दोस्त बनने को है आतुर, और दोस्ती में अभाव बहुत है।

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