अखबार का कोना

तहसील से लेकर सुप्रीम न्यायालय तक सिर्फ होता प्रस्ताव और मिलती है तारीख

( प्रवीण राय )

हिन्द भास्कर,
संपादक वाराणसी
भगवान न करे कि कभी आपको मुकदमे की मार झेलनी पड़े नहीं तो पहले कहा जाता था, कि बेटी की शादी खोजने में चप्पल घिस जाया करते थे। मगर अब जमाना बदल गया है, यदि ढंग का काम धंधा नहीं है, तो बहुतों को कुंवारा ही रहना पड़ेगा।मगर अब वह कहावत कोर्ट कचहरी पर फिट बैठने लगी है।एक साधारण से जमीन के मुकदमे में आपकी कई पीढ़ी निकल जाएगी।हम तहसील न्यायालय की बात करते हैं अरे जनाब गजब का सामंजस्य बैरिस्टर साहब और मजिस्ट्रेट साहब में होता है। किसी दिन बैरिस्टर साहब का कुत्ता मर जाता है, तो किसी दिन भैंस बिमार, फिर क्या प्रस्ताव हो जाता है।और वह प्रस्ताव मुवक्किल के लिए थोड़ी है।वह तो बेचारा कोसों दूर से आया, फीस दी, और एक छोटे से कागज के टुकड़े पर तारीख लिया, और सकुचाते हुए पूछा, अब क्या होगा।अरे घबराओ न यार अगली तारीख पर नोटिस, और उसके बाद डिमारलिस का आदेश, जे सी बी लगवाकर गिरवांएगे। फिर देखना कैसे मिमिआएंगे लोग।चलो यार इतनी दूर से आए हो कुछ चाय वाय पी लो। और तब-तक सामने वाली बेंच पर विपक्ष के बैरिस्टर साहब।मन ही मन अपना दुश्मन मानने वाला जब दोनों बैरिस्टरों की जुगलबंदी देखी तो मन बड़ा खुंदस में आया। खैर चाय-पानी करके बिल चुकता कर इस भरोसे पर निकला कि अगली तारीख पर तो कुछ न कुछ होना ही है। लेकिन वह तारीख ही नहीं आई जब बहस हो और सुनवाई हो।आलम यह है कि तीन महीने से लेकर छ: महीने तक बीत जा रहा है। कोर्ट ही नहीं बैठ रही है। और बस होता है प्रस्ताव, और मिलती है तारीख। उससे आगे कलेक्टरी न्यायालय का तो मत पूछिए जनाब हफ्ते में मात्र दो दिन ही चलना है और वह भी जिस दिन तारीख रहेगी यह पहले से तय है कि उस दिन प्रस्ताव होना है।अब बेचारे मजिस्ट्रेट साहब क्या करते, बैरिस्टर साहब की बदौलत तो कोर्ट चलनी है। वह नहीं चाहेंगे तो नहीं चलेगी, कौन जाए आफत मोल लेने। फिर वही धरना प्रदर्शन, जिंदाबाद मुर्दाबाद। आखिर इनकी भी तो रोजी-रोटी का सवाल है। बच्चे हैं,फीस कापी है। सारे मुकदमे समय से निपट जाएंगे तो कौन पूछेगा। बहरहाल दिवानी का तो जो भी दिवाना हुआ उसकी जिंदगी उसी में कट गई,और जाते-जाते अपने सबसे काबिल बेटे को थमा दिया ‌तारीख‌ की पर्ची।अब बेटा का भी नया खून,नया जोश। चल पड़ा न्याय के लिए उच्च न्यायालय और क्या था। चैंबर में घुसते ही माथा चकराया बाप रे बाप आज तक सात पुस्तें हमारी जितनी किताबें नहीं पढ़ी होंगी, उतनी किताबों को देख मन प्रफुल्लित हो उठा कि बाऊ जी जो आजतक नहीं कर पाए वह मैं पलक झपकते ही कर दूंगा। फिर क्या कागज पत्तर दिया मामले को समझाया और भरोसा मिला बस दो से तीन तारीख में निपटा दूंगा। कोर्ट बहुत अच्छी है अपनी फेवरेबुल है।जो मेरा बैचमेट था विश्वविद्यालय में उसके चाचा की बेंच है, धड़ाधड़ आदेश हो रहा है। बस उसको भी साथ मिला लूंगा, मामला फिट।मन बड़ा प्रसन्न हुआ चलो अच्छी जगह आ गए।अब फीस पूछा तो कहे अरे भाई दिवानी वाले वकील साहब मेरे बहुत करीबी हैं,वह बता रहे थे आपके बारे में।मेरा क्या कागज पत्तर और मुंशी जी का खर्च, आपसे और कुछ नहीं लेंगे कमाने के लिए बहुत लोग हैं।दो महीना बीता बड़ा संकोच करते हुए फोन मिलाया।अरे यार कोर्ट बदल गई कोई फेवरेबुल कोर्ट आए तो लगाऊं। मामला छ: महीने से आठवें में पहुंचा। झुंझलाते हुए रविवार को पहुंचा दिवानी वाले पुराने बैरिस्टर साहब के घर। उन्होंने फोन लगाया और कहा भाई साहब मैं बताया था कि यह मेरे रिश्तेदार भी हैं। फिर भी इतना विलम्ब।और पता चला फाइल लिस्टिंग में चली गई है।अब क्या होगा? नए साहब अपनी केस तो देख नहीं पा रहे हैं।लिस्टिंग क्या देखेंगे?धीरे-धीरे पांच साल हो गया, अपना जोश भी ठंडा पड़ने लगा। मन ही मन सोचा कहां से कहां फंसे, दो चार हाथ कम ही रहता। पैसा तो पैसा गया, इसके चक्कर में वर्षों से पट्टीदार से खाना पीना भी छूटा। और अब बात सुप्रीम की तो भाई सुप्रीम तो सुप्रीम होती है।यहां तो बैरिस्टर नहीं बड़े ही भयानक जीव सरीखे होते हैं।साहब इनके इशारे पर तो सरकारें चलती है।इनकी मरजी, करोंड़ों की डील हुई तो अफजल जैसे लोगों के लिए रात में 12 बजे भी साहब को बैठना पड़ेगा। और नाम ही काफी है फाइल में।न जाने कितनी बार मौका आया साहब बनने का लेकिन जो मजा बैरिस्टरी में वह साहबगिरी में कहां। वहां तो सीमित है और यहां असीमित। शायद कानून बनाकर आंख पर इसीलिए पट्टी बांध दी गई कि सही को गलत और गलत को सही दिख न सके।और यही कारण है कि अब कानून बनाने वालों का भी भरोसा कानून से उठने लगा है। क्योंकि जिस तरह दुर्दांत विकास दुबे को पुलिस ने मारा है।यह सच है कि भारत में इसी तरह के कानून की आवश्यकता है। नहीं तो‌ अभिनेता सनी देओल का फिल्मी डायलॉग कि कोर्ट से क्या मिलता है तारीख और सिर्फ तारीख और शायद‌ इसी डर से सरकार कोर्ट में न जाकर त्वरित फैसले पर भरोसा की।लेकिन एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर दिया कि क्या ऐसा न्याय सिर्फ खास लोगों को ही मिलेगा कि आम जनता को भी ऐसे न्याय का लाभ मिल सकता है। अगर ऐसा नहीं होता है तो निश्चित तौर पर भारत के संविधान पर, कानून व्यवस्था पर कार्यपालिका पर और मीडिया पर सवाल जरूर उठेगा।और जनता को सरकार के ज़बाब का इंतजार रहेगा कि क्या सरकार कानून ब्यवस्था में सुधार लाने का प्रयास करेगी? कि फिर वही प्रस्ताव और तारीख पर तारीख के दायरे में सिमट कर रह जाएगी कानून व्वयस्था।

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