चर्चा में

अमर मुलायम, समाजवादी पार्टी व अखिलेश

■ अम्बरीष राय

● श्रद्धांजलि विशेष

अम्बरीष राय (सम्पादक) उजेषा टाइम्स

सॉफ्ट हिन्दुत्व और उग्र राष्ट्रवाद की रेसिपी के कॉकटेल से जो सियासी डिश नरेंद्र मोदी ने बनाई, उसकी तोड़ अब तक खोजी नहीं जा सकी. लेकिन इसकी आधी अधूरी कॉपी करने वाले मुंह के बल जरूर गिरे. देश में बढ़ती कट्टर हिन्दू सोच से डरे विपक्षी थिंक टैंक ने सॉफ्ट हिन्दुत्व की तरफ कदम बढ़ाना शुरू किया. भाजपा चुनाव दर चुनाव सफलता के घोड़े पर सवार थी. भाजपा के फ़ायदे के लिए संघ ने यह मिथक गढ़ने की कोशिश कि कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दल मुस्लिम परस्त हैं और हिन्दू आस्था के खिलाफ़ खड़े रहते हैं. यह फार्मूला क़ामयाब भी रहा.इसी मिथ को तोड़ने के लिए राहुल गांधी जनेऊधारी ब्राह्मण के गेटअप में नज़र आने लगे तो प्रियंका गांधी के ललाट पर मंदिरों का तिलक चमकने लगा. ममता बनर्जी दुर्गा पूजा के लिए सक्रिय दिखने लगीं तो अखिलेश यादव की टीम भी उनके सच्चे सनातनी हिन्दू होने की तस्वीरें जारी करने लगीं. स्थापित सत्य तो यही है कि दिल्ली यूपी से सधती है. वाराणसी से सांसद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके सबसे मजबूत उदाहरण हैं. भाजपा का सिम्बल और खुद का चेहरा, मिलाकर नरेन्द्र मोदी ने ब्राण्ड मोदी बनाया. और यह ब्राण्ड अब तक अजेय है. जहां तमाम सियासी दलों ने सॉफ्ट हिन्दुत्व को फॉलो किया, वहीं अखिलेश यादव ने ब्राण्ड मोदी को फॉलो किया. ब्राण्ड मोदी को किसी अन्य भाजपा नेता या भाजपाई महापुरुष की जरूरत नहीं थी.

अपने मुख्यमंत्री रहने के आख़िरी साल में अखिलेश यादव ने मऊ के बाहुबली विधायक मुख़्तार अंसारी को पार्टी से निकाल दिया. इलाहाबाद के बाहुबली अतीक अहमद को अपने मंच से उतार दिया. समाजवादी उम्मीदों का नायक पार्टी से बाहुबलियों को बाहर करने पर आमादा था. पिता मुलायम सिंह अपनी बनाई पार्टी के बिखरने को लेकर चिंतित थे. चाचा शिवपाल यादव संगठन और सरकार पर अपनी ढ़ीली पड़ती पकड़ और पार्टी के भविष्य को लेकर हमलावर हो गए. भतीजे अखिलेश ने एक न सुनी. बाहुबलियों के बाद समाजवादी क्षत्रपों का नंबर आया. ओम प्रकाश सिंह, नारद राय, अम्बिका चौधरी, राजकिशोर सिंह, जैसे लोगों के पर कुतर दिए गए. संगठन और सरकार पर मजबूत पकड़ वाले शिवपाल यादव की मज़बूती उनसे छीन ली गई. शिवपाल यादव को पार्टी से निकाल दिया गया. मुलायम सिंह से अध्यक्ष पद छीन लिया गया. सरकार में वरिष्ठ मंत्री रहे आज़मगढ़ के बलराम यादव मंत्रिमंडल से निकाले जाने के बाद टीवी पर रोने तक लगे. टीपू भईया अपनी तलवार चलाते गए, मुलायम के लोग कटते गए. सुल्तान हटाये गए लोगों की जगह नए लोगों को सूबेदार बनाता गया. कुछ पुरानों ने वफ़ादारी बदल अपनी हैसियत बचाई, वो फिर कभी.

अपनी अपनी सीटों से हार गए कई बड़े नेताओं ने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव ने सिम्बल देने के बाद उनको हराने के भी इंतज़ाम किया. अब अखिलेश यादव थे और उनके आस पास नई समाजवादी उम्मीदें. इन समाजवादी उम्मीदों और ढहाए गए क्षत्रपों की तुलना करें तो बड़ी दिलचस्प तस्वीर उभरती नज़र आती है. पुराने बादशाह के पास जो दरबार था, उसके दरबारी अपने इलाके के प्रभावशाली लोग थे. उनके पास उनकी जाति, धर्म, के नाम पर लोगों का मजबूत समूह था. जब सारे दरबारी जुटते थे, तो राजा और दरबार दोनों एक बड़ी ताक़त हो जाते थे. क्षत्रपों की ताकत से मुलायम सिंह ने राजनीति को साधा. जबकि अखिलेश यादव का जो दरबार है, वो अखिलेश यादव से ही प्राणवायु प्राप्त करता है. समाजवाद की इन नई उम्मीदों को अखिलेश यादव के नाम पर अपना क्षेत्र बनाना है. मुलायम सिंह ने ज़मीन पर बैठकर राज प्रासाद बनाने की रणनीति बनाई है, अखिलेश यादव राज प्रासाद में बैठकर उसको बचाने की रणनीति बनाते रह गए.

अब सवाल उठता है अखिलेश यादव ने ऐसा क्यों किया और वो चूक कैसे गए. जबकि जिस मॉडल को उन्होंने अपनाया, वो तो पूरी तरह से हिट था. आईये समझने की कोशिश करते हैं. नरेंद्र मोदी ने जब गुजरात के मुख्यमंत्री का पद सम्हाला तो उनके ऊपर कोई दाग नहीं था. 2001 के गुजरात दंगों में उनकी जो भी भूमिका रही हो लेकिन इससे उनकी गुजरात की सत्ता मजबूत हो गई. साथ ही देश में वो हिन्दुत्व के सबसे बड़े रक्षक के तौर पर एस्टेब्लिश हो गए. गुजरात दंगों के बाद बढ़ती ताकत के साथ उन्होंने धीरे धीरे पार्टी और पार्टी के बाहर के लोगों को निपटाया. संगठन को लेकर चले. लोगों का समर्थन बढ़ता रहा, विरोधी निपटते गए. गुजरात संघ विश्व हिन्दू परिषद की हिन्दुत्व की प्रयोगशाला थी. विहिप के दिग्गज नेता प्रवीण भाई तोगड़िया के सारे सफल प्रयोग मोदी के साथ खड़े थे. वैचारिक लोकतांत्रिक संगठन होने के नाते मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग वैसे भी भाजपा को वोट करता है. सरकार पर भ्रष्टाचार के कोई मजबूत आरोप भी नहीं थे. वहां से निकला ब्राण्ड मोदी जब देश को साधने निकला तो साथ थी देशव्यापी विशाल संगठन की ताकत. धर्म विशेष को सीमाओं में रखने का नैरेटिव, चोटी के उद्योगपतियों के साथ, उम्मीदों के मोर्चे पर हारी दस साल पुरानी सरकार. फार्मूला काम कर गया. मोदी ने जो गुजरात में किया, वहीं उन्होंने दिल्ली में भी किया. लेकिन मजबूत रहके, मजबूत लोगों का साथ लेके.

अखिलेश यादव ने जब ब्रांड मोदी की रेसिपी फॉलो की तो वो चुनावों में जाने वाली एक सरकार के मुखिया थे. उनकी व्यक्तिगत छवि भी अच्छी थी. सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी थी, लेकिन उसका दाग अखिलेश यादव पर नहीं था. सरकार के सारे बुरे काम का ठीकरा शिवपाल यादव के सिर पर फोड़ा जा चुका था. उपलब्धियां गिनाने को कुछ काम भी थे. लेकिन एक कमी ये थी कि ब्रांड बनने के लिए सही समय की समझ और सही निर्णय साथ नहीं था. नहीं था तो शिवपाल का साथ. नहीं था तो अमर सिंह का साथ. नहीं था तो क्षत्रपों का साथ. नहीं था तो मुलायम सिंह का साथ. साथ था तो एक जाति विशेष के आक्रामक युवाओं का साथ, जिनकी आक्रामकता ने एक बड़े मतदाता वर्ग को अखिलेश यादव से दूर ही किया. समाजवादी पार्टी की सरकार बनने पर उसके जाने के मार्ग का पहला पत्थर यही आक्रामकता रखती है.

जो साथ नहीं थे, उनके मायने समझिए. मुलायम सिंह की सियासी समझ से बने समाजवादी राज्य के हर हिस्से तक शिवपाल यादव की पहुंच और स्वीकार्यता थी. मुलायम सिंह के बनाये रिश्तों और सियासी समीकरणों को शिवपाल पानी ही देते रहे, कभी उससे छेड़छाड़ नहीं की. कार्यकर्ताओं का आउट ऑफ वे जाकर काम किया. हर कार्यकर्ता को एहसास कराया कि सरकार उसकी है. सुनते रहे दोस्त की तरह, ख़याल रखा अभिभावक की तरह. अमर सिंह एक ऐसी ताक़त जिसे मुलायम सिंह ने समझा. और अघोषित रूप से पार्टी में नंबर दो की हैसियत दी. अमर सिंह ने समाजवादी पार्टी को कभी फंड की कमी नहीं होने दी. देश के दिग्गज उद्योगपति एक फोन कॉल पर लखनऊ पहुंच जाते थे. हैसियत इतनी कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चुनावों के समय अमर सिंह का नाम लेकर हिलेरी क्लिंटन को घेरा था. आरोप था कि अमर सिंह ने हिलेरी क्लिंटन को लाखों डॉलर दिए. कितनी बार मुलायम सिंह के लिए सियासी पेंच दुरुस्त किये. ये सब पब्लिक डोमेन में है. अपने अपने क्षेत्रों में ताक़त रखने वाले समाजवादी नेता इस कदर ठोंके गए कि उनकी राजनीतिक ताकत बस उनके लिए सिमटकर रह गई. कुछ ने पार्टी छोड़ दी, कुछ निकाल दिए गए. जो बचे, वो खुचे ही रह गए. ये सारे लोग अपमान के आखिरी स्तर तक अपमानित किये गए. ये सारी कमियां तब कमियां नहीं होतीं, जब वोट अखिलेश यादव के चेहरे के नाम पर पड़ता, लेकिन ऐसा हो न सका. अखिलेश यादव की यह राजनीतिक चूक रही. समाजवादी पार्टी में जुड़े समाजवादी शब्द को इसके मुखिया को आत्मसात करना पड़ेगा, उस मार्ग पर चलना पड़ेगा. समाजवादी सरकार में एक मंत्री जी ने एक बार अपना अनुभव साझा किया. उन्होंने बताया कि कुछ लोगों ने मेरे ऊपर जाति विशेष का पक्ष लेने की शिकायत मुलायम सिंह से की. मुलायम सिंह ने मुझसे कहा कि तुम्हारी इस तरह की शिकायत आ रही है. सवर्ण समाज के मंत्री जी ने तब मुलायम सिंह से कहा था कि आपने मुझे समाज को पार्टी से जोड़ने के लिए कहा था, आप कहिये तो समाज के एक व्यक्ति से भी ना मिलूं. मुलायम सिंह ने पीठ ठोंकते कहा, ठीक कर रहे हो, गोरखपुर से गाज़ियाबाद तक समाज को जोड़ो. आज वो मंत्री जी दूसरे दल में हैं.
(अमर सिंह आज इस दुनिया में नहीं रहे. कल ही उनका सिंगापुर में निधन हो गया, उनको श्रद्धांजलि देते हुए उनकी पुरानी पार्टी पर एक विश्लेषण )

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