रचनाकार

बस जा रही थी, अपने वेग से हवाएँ चल रही थी, अपने वेग से

@ जितेंद्र कुमार झा…

बस जा रही थी, अपने वेग से
हवाएँ चल रही थी, अपने वेग से
वातावरण शांत था, चारों ओर
कौतूहल निगाहों से देखता मैं
आधी पकी हुई गेहूँ के बाल और
आधी पकी हुई अपनी दाढ़ी को
कि अचानक झटका सा लगा,
बस के ड्राइवर ने लगाया था ब्रेक
शरीर स्थिर, सिर झुका आगे की ओर
चिंतन कर रहा था मन
अपने बीते समय के वेग को,
क्या छूटा, क्या पाया के बीच
खाली सीट पर रखा अपने बैग को,
जो इंतज़ार कर रहा था किसी सहयात्री का,
जो पूरा करता, यात्रा के दौरान उत्पन्न आवेग को
रुकी बस, कुछ उतरे यात्री
आयी उनकी अपनी मंज़िल
कुछ चढ़े बस में, लेकर अपनी गठरी
कुछ निगाहें चंचल, कुछ स्थिर
मैं भी देखा इधर – उधर
खाली बस की सीट और बैग को
जो इंतज़ार कर रहा था किसी सहयात्री का,
जो पूरा करता, यात्रा के दौरान उत्पन्न आवेग को।
शांत था वातावरण चारों ओर
कौतूहल निगाहें अब भी,
देख रही थी, आधी पकी गेहूँ के बाल,
और आधी पकी हुई अपनी दाढ़ी को
सीट अब भी खाली थी,
बस चल रही थी अपने वेग से।

 

पता- मकान नंबर 395 / ए निजामुद्दीनपुरा मऊ

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