रचनाकार

जलता हुआ चिराग़ हूं…

@ चुन्नू लाल गुप्ता…

जलता हुआ चिराग़ हूँ, यूं तो ज़माने के लिए
लोग जलाते हैं,‌ अंधेरा मिटाने के लिए —

मन्दिरों के ठौर, देखी हैं कुछ सच्चाईयां
बोलते पत्थर नहीं, सच को बताने के लिए

बेजान पत्थरों पे देखी आस्था है इस क़दर
सर झुकाते हैं, सभी बिगड़ी बनाने के लिए

मांग सकता है जो जितना मांगता है उम्रभर
वर मांगता है वो नहीं मैं को मिटाने के लिए

घर में ख़ुशी के वास्ते जो पुजता है देवियां
करता नहीं कोई जतन,बेटी बचाने के लिए

बदलता है रंग रूप वो, बघारता है शेख़ियां
ज़िद्द है,वह जो है नहीं उसको दिखाने के लिए

ख्वाहिशें लाखों है लेकिन, चाहता है और से
छुपा लेता है सारा ज़ख्म,बाप घर बचाने के लिए

बड़ा गुनाह है “चुन्नू” अब तो सच भी बोलना
निकल पड़ते हैं सिरफिरे,हस्ती मिटाने के लिए

••• कलमकार •••
चुन्नू लाल गुप्ता-मऊ (उ.प्र.)

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