स्वभाषा में रचा गया साहित्य समाज, सभ्यता, संस्कृति को बचाए रखता है : स्वामी ओमा दी अक्क

दुनिया की बड़ी बड़ी सभ्यताएं सिर्फ इसलिए मिट गईं कि उनकी भाषा मिट गई। मिश्र के पिरामिड तो खड़े रह गए लेकिन उसकी लिपि पढ़ी नहीं जा सकी। नतीज़तन मिश्र की सभ्यता नष्ट हो गई। एक राष्ट्र के तौर पर मिश्र नष्ट हो गया। हजारों सालों से एक सभ्यता और राष्ट्र के तौर पर भारत बस इसलिए जीवित रह पाया क्योंकि भारत की भाषा जीवित रही।
उपरोक्त उद्गार स्वामी ओमा दी अक्क के हैं। स्वामी ओमा हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में अक्क संस्थान द्वारा लखनऊ के जागरण चौराहे पर स्थित एक होटल में आयोजित ‘हिंग्लिश के दौर में हिन्दी ‘ विषयक संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। आगे उन्होंने कहा कि भाषा की सुचिता सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। स्वभाषा में रचा गया साहित्य समाज, सभ्यता, संस्कृति को बचाए रखता है। बोली के स्तर पर अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग समझ में आता है, लेकिन यही शब्द जब साहित्य में घुसने लगते हैं तो भाषा की मर्यादा भंग करने के साथ संस्कृति को नष्ट करने लगते हैं। उन्होंने कहाकि आज हिन्दी के सामने जो सबसे बड़ा संकट है, वो यही घुसपैठ है। उन्होंने कहाकि मैं भाषाई कट्टरपंथ के समर्थन में नहीं हूँ और ना ही अंग्रेजी के प्रति शत्रुता का भाव रखता हूँ, लेकिन जब हिन्दी के सामान्य प्रचलित शब्द मौजूद हों तो अनावश्यक अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग हिन्दी भाषा को प्रदूषित करता है। उन्होंने कहा कि प्रदूषित भाषा प्रदूषित समाज का निर्माण करती है, जो बिल्कुल स्वीकार नहीं की जा सकती। उन्होंने कहाकि जहाँ एक तरफ विश्व के तमाम देशों ने भाषा को आवश्यकता की तरह देखा, माना वहीं भारत ने भाषा को आवश्यकता, अभिव्यक्ति से परे अपने विस्तार की तरह देखा। संगोष्ठी को संबोधित करते हुए जनकवि और हिन्दी के युगपुरुष उदय प्रताप सिंह ने कहा कि हमारी चिन्ता बोलचाल में अंग्रेजी के शब्दों को लेकर नहीं है। उन्होंने कहाकि तमाम ऐसे शब्द हैं जो अंग्रेजी के हैं, उनको हिन्दी में लिखा जाना प्रचलन में नहीं है। उन्होंने मेज, कुर्सी, शिकायत, ट्रेन, प्लेटफॉर्म जैसे शब्द भी गिनाए, जो हिन्दी के नहीं है। भारतीय भाषा उर्दू के विषय में उन्होंने कहाकि उर्दू और हिन्दी में मात्र लिपि का फ़र्क है। भारत की अन्य in theभाषाओं के शब्दों से हिन्दी का सौंदर्य बढ़ता है, सुचिता बनी रहती है जबकि अंग्रेजी के साथ हिन्दी कमतर दिखने लगती है। उन्होंने कहाकि बोली और भाषा में बस इतना फ़र्क है कि जहाँ बोली का साहित्य कमज़ोर होता है, वहीं भाषा का साहित्य समृद्ध होता है। उन्होंने कहाकि साहित्य के साथ संस्कार जुड़ा होता है और जब भाषा के साहित्य में हिंग्लिश का प्रवेश होगा तो भाषा का संस्कार चला जायेगा। उन्होंने कहाकि साहित्य पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है तो आप समझें कि पीढ़ियों का संस्कार चला जायेगा।

इस अवसर पर हिन्दी के लब्ध प्रतिष्ठित विद्वान डी. एन. लाल ने कहाकि हम प्रारंभ से ही अपने बच्चों को विदेशी भाषा सीखने में लगा देते हैं, बाद में वही बच्चा उसी भाषा में बोलना, जीना अपना गौरव समझने लगता है और मातृभाषा दोयम हो जाती है। उन्होंने कहाकि भाषा के स्तर पर हम भटक चुके हैं और कहीं न कहीं इसके लिए नेतृत्व ज़िम्मेदार है।

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. अम्बरीष राय ने गोष्ठी का विषय रखते हुए कहाकि एक भाषा के तौर पर अंग्रेजी का सम्मान है लेकिन जब ये हिंग्लिश हो जाती है तो काफी हास्यास्पद लगने लगती है, अधकचरी हो जाती है। उन्होंने कहाकि दुर्भाग्यपूर्ण है कि अंग्रेजी बोलना गौरव का विषय हो गया है और हिन्दी बोलना अपमान और पिछड़ेपन का प्रतीक।
हिन्दी कवि चंद्रशेखर वर्मा ने कहाकि हिन्दी का एक बड़ा नुक़सान सिनेमा ने भी किया, जहाँ हिन्दी का शिक्षक हमेशा दीन हीन रहा या फिर कॉमेडियन बनकर रह गया। उन्होंने कहाकि हिन्दी में जितनी शुद्धता आ सके उतना ही अच्छा है। हिन्दी के शब्दों की जगह अंग्रेजी के शब्द नहीं डाले जाने चाहिए। दुबई से आए उर्दू के विद्वान सैय्यद सलाउद्दीन ने कहाकि रोज़गार से ना जोड़े जाने के कारण हिन्दी अंग्रेजी से पिछड़ गई। उन्होंने कहाकि अंग्रेजी बोलते बच्चों को देखकर हम लोग खुश होते है, यही तस्वीर हमने बनाई है। इस अवसर पर अनिल मिश्रा आईएएस और श्रीमती कुसुम वर्मा प्रधानाचार्या राजकीय बालिका इंटर कॉलेज ने अपने हिन्दी गीतों से परिवेश को एक नई दिशा दी। इस अवसर पर सर्वश्री हरिप्रताप शाही, अनिता नारायण, प्रमोद चौधरी, गुंजन सिंह, समर मुखर्जी, ओम वर्मा, सुश्री मंजू श्रीवास्तव, सुश्री मनोरमा इत्यादि गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
संगोष्ठी में आए लोगों का स्वागत समरराज गर्ग ने किया।डॉ. अर्चना दीक्षित ने आगत अतिथियों को पुस्तक देकर सम्मानित किया। संगोष्ठी का सफल संचालन अमित श्रीवास्तव ने किया।

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