बुत-गरी मुझसे अजन्ता का अमल माँगे है!
संजय दुबे ( वरिष्ठ पत्रकार )
“सियासियात से मुझे कोई दिलचस्पी नहीं। लीडरों और दवा फ़रोशों को मैं एक ही जुमरे में शुमार करता हूँ। लीडरी और दवा फ़रोशी, ये दोनों पेशे हैं। दवा फ़रोश और लीडर दोनों दूसरों के नुस्खेँ इस्तेमाल करते हैं।”
( सआदत हसन मंटो )
आज़ कल अपनी पालिका के चर्चे सरे -आम हैं। मौजूदा चेयरमैन और मेंबरानों की कार्य शैली से शहर परेशान नहीं, हैरान है। लगता है ये ‘पोलिटिकल कश्मकश ‘ उनके दौर में भी रही होगी, वरना वो, ये बात क्यों लिखते?बहरहाल, मसला विकास का है जो कि फिलहाल जाम के झाम में धीरे – धीरे सरक रहा है। अगर, ये मुद्दा नहीं सुलझा तो ‘विकास’ का क्या होगा? इस पर कहीं ‘ चिंतन शिविर ‘ न आयोजित करना पड़ जाय?जिसमें देश – प्रदेश के इस किस्म की समस्याओं को जड़ – मूल से नष्ट करने वाले विद्वान ‘डेमोक्रेसी ‘के लिए कोई संभावित कदम उठाये? हालांकि अभी ऐसा होने की दूर – दूर तक कोई गुंजाइश नहीं दिखती, क्योंकि चेयरमैन साहेब को ‘ आपदा प्रबंधन ‘ में महारत हासिल है। याद कीजिये, उनके टिकट का मामला । मित्रों! सुनने में आ रहा हैं कि अभी पालिका सियासत में जो ‘ हरारत ‘ महसूस हो रही थी उसके ‘सियासी बुखार’ में तब्दील होने के पूरे आसार हैं। क्योंकि ‘जानकार ‘बता रहें है कि इसे फ़ौरी तौर पर फ़िलहाल ‘ पैरासीटामाल ‘ से बढ़ने नहीं देने की कोशिश जारी हैं, अगर ये मर्ज़ ठीक नहीं होता हैं तब, कुछ लम्बा इलाज चलेगा। हालांकि इसके आसार नहीं हैं। मगर, फ़िर भी? बीमारी का क्या हैं? इसी सिलसिले में मिल गये अपने ‘ चुन्नू मियां ‘ जिनका पोलिटिकल प्रेम जग – जाहिर हैं। इनके अपने ‘ सोर्स ‘ है। ईरान -इजराइल युद्ध हो या ‘ उप राष्ट्रपति जी ‘ का इस्तीफ़ा उनको सब पता हैं? पालिका की राजनीति को तो इतना क़रीब से जानने का उनका दावा हैं कि टिकट मिलने, कटने से लेकर जीतने तक की रिपोर्ट पहले ही उनके पास पहुँच जाती हैं।
‘ टल गई म्युनिस्पिल बोर्ड की मुसीबत’ – चुन्नू मियां ने लंबी उबासी लेते हुई ये बात कही। इन्हें,सारे शहर की नब्ज़ मालूम है। गोया, किसका माल आज़-कल ज़्यादा बिक रहा है, किसका कम? कौन पार्टी तगड़ी पड़ रही है किसकी है सेहत ख़राब। अगला विधायक कौन होगा? किसका टिकट कटेगा? कौन बीजेपी का नया नेशनल सदर होगा और किसके सर होगा सूबाई सदर का ताज़? इन्हें सब पता है? शुगर और कोलेस्ट्राल के बढ़े लेबल के चलते टहलना इनकी मजबूरी है, फ़ितरत नहीं। मिल गये कल। सलाम दुआ के बाद आदतन शुरू हो गये -” बताइये! ये भी कोई सियासत है? दो-चार दिन…..’ मुर्दाबाद! मुर्दाबाद!…. हाय!हाय!’ फ़िर -‘ज़िंदाबाद! ज़िंदाबाद!’ अरे! ये कौन सी बात हुई, मियां? अगर इतनी ही चेयरमैन से शिकायत थी तो इतना हो – हल्ला काहे मचाये? फ़िर, उन्हीं की बातों को मान ही नहीं लिये बल्कि थोड़ी ग़लतफहमी की बात कह उसके सुधरने का भी ऐलान हो गया। ये बात चुन्नू मियां को समझ में नहीं आयी। उन्हें जेहनी तौर से बड़ी चोट पहुंची है इस बात से। मैंने कहा -‘ मियां! ये हमारे आपके बस की बात नहीं जो सियासत को समझ सकें। हमारे आप जैसे लोग बस ज़ज़्बाती वोटर हो सकते है, सियासी लीडर नहीं। हम लोगों के मसायल ग़ालिबन मुख़्तलिफ़ किस्म के होते हैं । मसलन, बच्चों की तालीम, फ़ीस, कारोबार, नौकरी, सेहत, बिज़ली के बढ़े बिल, अहले ख़ाना की शिकायतें,रोज़ की ज़रूरीयात। इनसे पहले निपटो फ़िर सियासत को समझो। ‘भिन्न’ से भिन्न वाली गणित है ये। क़िताबों और स्कूल, मदरसों में भी इनकी पढ़ाई नहीं होती। ज़ेब और ज़ज़्बात की जाती समझ होनी चाहिए।उन्हें लगा कि मैंने उनकी काबिलियत पर बिला वज़ह शकों शुब्हा किया है इसलिए वो पाजामे से बाहर होने के मानिंद बोले -” आप हमें सियासत बतायेंगे? अरे! हमें सब पता है। सियासी पकड़ आज़ की तारीख़ में मेरी सबसे बीस है। ” मैंने कहा -‘मियां! आप खुद आला दर्जे के सियासतदाँ है। मज़बूरी में आप कारोबारी हैं । हमें पता हैं । आप कारोबार और सियासत दोनों को तिज़ारत समझते हैं । जहाँ तिज़ारती ख़्यालात हो वहां ख़्वाब में भी नुकसान बर्दाश्त नहीं होता। फ़िर हकीकत में ये कैसे मुमकिन होगा ? ‘
ये बात उन्हें तीर की तरह चुभी और उन्होंने रौ में बह कर बोलना शुरू कर दिया -‘ नहीं, नहीं आप ही बताइये! आखिर कल तक भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाले आखिर अचानक से कैसे चेयरमैन साहब को पाक़ – साफ़ मान लिए? ‘ मैंने कहा -‘ अरे भाईजान! गलतफहमियाँ,ग़फ़लत में ही होती है। मेंबरान लोग भी उसी तरह से चुने गये हैं जैसे चेयरमैन। तवज्जोँ उन्हें भी उतनी मिलनी चाहिए जितनी चेयरमैन को। पालिका के कर्मचारी, इंजीनियर,टैक्स इंस्पेक्टर उनकी भी बातों पर गौर फ़रमाएं,बस! यहीं तो उनको चाहिए था मिल गया। शिकायत खत्म। ये भी कोई बात हुई कि बिना मेंबरान से मिले उनके इलाके में ही इंटरलाकिंग, नाली निर्माण हो? ये गैर लोकतान्त्रिक है। आखिर उनके इलाके में कौन सा काम कैसे होगा? उसे करवाने का उनको भले अख़्तियार न हो पर जानने का तो हक़ है?’ इस बात से चुन्नू मियां सहमत दिखें। जिसके एवज में हाँ की मानिंद उनकी मुंडी हिली। मैंने कहा – चुन्नू मियां सियासी किचकिच तो खत्म हुई अब मेंबरान और चेयरमैन साहब पहले शहर के लोगों को ‘स्प्राइट’ तो पिलाने से रहें कम से कम मानक के अनुरूप पेयजल तो पिलायें ही पिलायें । जलापूर्ति की पाइप ठीक करायें । लिवर के मरीज़ शहर में बढ़ रहे हैं। बंद पड़ी नालियों को साफ़ कराएं। हो सकें तो कूड़ा जरा सड़क पर से सुबह उठवाएं। कचरा सड़क पर फेंकने वालों पर पाबन्दी लगाये। पालिका की सेहत के लिए भी शहर के बाशिंदो और उसकी गलियों, सड़कों का सेहतमंद, दुरुस्त होना निहायत जरुरी हैं। समझ में आए तो मियां जरा इन शेर पर गौर फ़रमाएं –
सभी मानिंद मेंबरानों के लिए –
ये नई तर्ज़ -ए -सियासत ये जबूँ -हाली (दुर्दशा )अब
हमसे माथे पे कुछ अफ़कार ( दृष्टिकोण )के बल माँगे है
(तशना आज़मी )
ज़नाब चेयरमैन साहेब के लिए भी तो एक शेर बनता हैं –
इस जुनूँ ने मुझे इस दर्जा शरफ़ ( महानता ) बख्शा है
बुत-गरी (चरागदान ) मुझसे अजन्ता का अमल माँगे है
(तशना आज़मी )
( नोट : अफ़कार में आधा फ पढ़े, गूगल महोदय को लिखने में तकलीफ़ समझ में आ रही हैं लिहाज़ा इसे सुधार कर पढ़े )

