रचनाकार

पी लेंगे अगर वो मुझे मोहब्बत में जहर भी दे, छूकर दे वो जहर भी तो वो जहर नहीं होता

कुछ तो लोग कहेंगे…
बृजेश गिरि

अब उनकी बद्दुआओं का असर नहीं होता,
हर दर्द दिल का यूँ चश्म-ए-तर नहीं होता।
मुमकिन है उनको एहसास -ए-दर्द न हो क्यूँ कि,
हर जानिब दर्द-ए-इश्क बराबर नहीं होता।
जुदाई तो दुनिया का इक दस्तूर है साहेब,
कोई किसी से जुदा चाहकर नहीं होता।
ऐसे देखते हैं जैसे कुछ खबर नहीं उनको,
यूँ कोई दुनिया से बेखबर नहीं होता।
कल रात उनकी याद में बेचैन था बहुत,
इतना कोई परेशां ,रात भर नहीं होता।
पूछते हैं लोग मुझसे मेरे ठिकाने का पता,
अहले दुनिया हो जिसकी,वो बेघर नहीं होता।
पी लेंगे अगर वो मुझे मोहब्बत में जहर भी दे,
छूकर दे वो जहर भी तो वो जहर नहीं होता।

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