अर्चना स्वर्ग से पूछ रही, क्या हुआ, मानवता मर गई या जिन्दा है

मेरी कलम से…
आनन्द कुमार
कर्तव्य निभा रही थी,
पूरी कोशिश लगा रही थी,
पढ़ाई की पूरी ताकत,
योग्य सेविकाओं के साथ,
दिखा रही थी,
लेकिन रोग जटिल था,
वह हार गई,
लाख कोशिश के बाद भी,
बचा न सकी,
हां उस डाक्टर की,
वह बहन, बेटी नहीं थी,
पर दर्द उसे भी हुआ होगा,
किसी ने एहसास ना किया होगा।
फिर क्या,
भड़क गये वे लोग,
जो जानते नहीं थे,
प्रसूता के मौत का,
कोई ए बी सी डी कारण,
उतार दिए सारा गुस्सा,
डाक्टर के ऊपर,
घेर लिए उसकी कई साल की,
पढ़ाई को पल भर में,
नहीं समझे,
उसके गोल्ड मेडलिस्ट होने का मतलब,
सीधे सीधे, जिम्मेदार बताया,
मौत का कारण डाक्टर को ठहराया।
पति को भी नहीं बख्शा लोगों ने,
इतना सब के बाद,
पुलिस आई होगी,
वह भी अपने ला एण्ड आर्डर को लेकर,
डाक्टर पर ही गुर्राई होगी,
पुलिस को तो नौकरी करनी थी,
वह नौकरी कर गई,
एक के साथ दो लाश की पंचनामा कर गई,
पहली मौत की जांच बाकी है,
लेकिन दूसरी मौत का आखिर जिम्मेदार कौन है?
आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी थी,
जो अर्चना को विवश होना पड़ा मौत के लिए,
आखिर वह कौन सा शब्द था, जो अर्चना को चुभा,
जहर से भी ज्यादा,
आखिर वह कौन सी बात थी,
जो दूसरों को समझाने वाली, खुद ना समझ सकी,
आखिर वह कौन-कौन है,
जो मजबूर किया अर्चना को,
आत्महत्या के लिए,
इन सभी एक-एक पहलुओं को,
सोचना और समझना होगा,
आखिर इस तरह से किसी प्रतिभा को,
क्या हक है हमें, कि मौत देना होगा।
अर्चना लौट कर तो नहीं आएगी,
लेकिन उसके शब्द,
मैंने किसी को नहीं मारा,
मेरा मरना शायद बेगुनाही साबित कर दे,
यह हर एक शख्स और सिस्टम को,
ज़िन्दगी भर के लिए,
जीते जी मार जाएगी।
अर्चना स्वर्ग से पूछ रही,
क्या हुआ, मानवता मर गई या जिन्दा है,
या विश्वास आज भी अंधा है।

