रचनाकार

ठोकरें खाकर गिरा ,फिर भी खड़ा हूं,
‘बाप हूं’ तुमको बचाऊंगा, अड़ा हूं!

डा. प्रमोद कुमार अनंग

ठोकरें खाकर गिरा, फिर भी खड़ा हूं।
‘बाप हूं ‘ तुमको बचाऊंगा, अड़ा हूं।।
चोट लग जाए, न तेरे पांव में।
फूल बनकर राह में, हरदम पड़ा हूं।।
गोद,अंगुली, हाथ,कंधे सब तुम्हारे।
तेरी हर सांसो में, मैं ही तो जड़ा हूं।।
बहकने के रास्ते, मैं जानता हूं।
अनुभवी आंखें हैं,मैं तुमसे बड़ा हूं।।
आंधियां,तूफान,लहरों से, लड़ूंगा।
सांस है,वटवृक्ष हूं, जमकर गड़ा हूं।।
मेरे तन के बदबुओं से, भागते हो।
हर बीमारी में तुम्हारे, में सड़ा हूं।।
फूट जाऊंगा, तुम्हारे सामने ही।
मैं दुवाओं से भरा, कच्चा घड़ा हूं।।
डांटता हूं कि, बिखरने से बचो तुम।
नारियल की ही तरह, मैं भी कड़ा हूं।।
‘बाप हूं’ तुमको बचा लूंगा खड़ा हूं।।…”अनंग “

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