यूँ बनेगी गली तब जाकर लगेगी कि पालिका के पैसे से बन रही है गली

संजय दुबे…
मऊ शहर की बात…गली का नाम -राजपुताना दक्षिण टोला. निर्माण प्रकार -नई इंटरलोकिंग. समय अवधि -ठेकेदार के कार्य अनुसार.जनता की असुविधा की सुनवाई – छोड़िए भी, चुनाव नहीं है कि इसका ख्याल रखा जाय. देखिये, यही लोकतंत्र है. जिसे जो जी में आये करें. नेता भाषण दें. जनता सुनें. ताली बजाये, और कहें -हमारा नेता कैसा हो।….. फ़लाने जी जैसा हो.. जी हाँ!इसकी बानगी देखनी है तो आइए दक्षिण टोला. देख लीजिये. कहने को तो इस गली में भाजपा के कद्दावर नेता रहते है. कुछ तो इतने बड़े है कि योगी जी से नीचे बात ही नहीं करते. कुछ का कहना और मानना है कि मऊ का प्रशासन उनसे हिलता है. वो चाहे तो ये हो जाये, न चाहे तो वो हो जाय. इन बड़े नेताओं कि गली पिछले बीस दिनों से बन रही है. पर अफ़सोस कि अभी तक एक तरफ की जी नाली बन पायी है. काम का तरीका मानक के इतना अनुरूप है कि नाली के कचरे और मिट्टी को गली में यूँ ही छोड़ दिया गया है.ख़ुफ़िया रिपोर्ट ये बता रही है कि इस मलबे को गली में बिछा कर उसी के ऊपर सीमेंटेड ब्रिक लगा दी जाएगी. भस्सी के ऊपर बिछाने से सीमेंटेड ब्रिक जल्दी ख़राब नहीं होगी. अगर वो जल्दी ख़राब नहीं होगी तो फिर नई बनेगी कैसे? अगर मानक के अनुरूप बन गयी तब फिर सरकारी गली कैसी? खैर!मोहल्ले वालों का दर्द जरा अलग किस्म का है. कोई पटीदार अपने पटीदार को ठीक कर रहा है तो कोई अपनी जिला प्रशासन में पहुँच दिखा रहा है? नतीजा!गली के बाशिंदे चाहे वो बच्चा हो, बूढा हो, जवान हो, इस पर चलते वक़्त डगमग -डगमग करता गिर जा रहा है तब उसे पता लग पर रहा है कि, हाँ तो भाई मुहल्ले में नेताओं का जलवा है. वो भी भाजपा का. खैर, अब निरीह जनता कि स्थिति कसाई के यहां बँधी भैस सी हो गयी है जिसे ये गंध आ रही है कि वहां उसके जैसे ही लोगों का खून हवा में तारी है. रही बात शासन, प्रशासन की तो उसकी हालत योगी सी है. एक ठीक करों दूसरा गड़बड़ा जा रहा है. यह गली एक महीने से बन रही है. आखिर डीऍम साहब कहा तक देखे. पूरा जिला देखना है. सिटी मजिस्ट्रेट साहब भी क्या क्या देखें? अवैध बिल्डिंग निर्माण रुकवाएं, जमीन का मुकदमा देखें, की शहर की इस गली को देखें? ईओ साहब!इनके पास भी कहां फुर्सत है जो शहर की गलियों में रहने वाले बुनकरों, मजदूरों की समस्या सुनें. सिविल लाइन्स की नाली साफ कराए या नाली के कचरे पर बन रही गली को मानक के हिसाब से बनता देखें. जनता है, भूल जाएगी. जब बड़ी बड़ी सड़कों पर चल उसका मानक भूल गयी तो ये गली कब तक याद रखेगी? महीने भर में इतना उसे तंतर मंतर दिख जायेगा कि वो भूल जायेगा कि जिस गली में वो रह रहा है दरअसल विकास तो उस गली से कई किलोमीटर दूर हुआ है, गली में तो बस उसकी परछाई है. बाकी चलते है अब! कही और? सबको राम राम! आदाब!


