रचनाकार

शब्द मसीहा! प्यार की चिंता

@ शब्द मसीहा केदारनाथ…

कई वर्ष बाहर नौकरी करने के बाद पति वापिस काम करने अपने शहर लौटा। सुबह अपने कपड़े उठाकर रख देता , छुट्टी वाले दिन घर की सफाई करता, कपड़े धोने और सुखाने में मदद करता । सब्जी-भाजी के लिए पत्नी के साथ जाता । न कहने पर भी वह रसोई में हाथ बंटाने लगता। पत्नी इन आदतों से हैरान थी। उसे आश्चर्य होता कि क्या ये वही आदमी है जब महीनों के लिए दूर जाता था तो मुड़कर भी नहीं देखता था।

पत्नी ने सारे काम निपटाए और जब हाथ में दूध का गिलास लिए कमरे में प्रवेश किया, तो पति एक तरफ खड़ा हुआ पत्नी के कपड़े प्रेस कर रहा था । पत्नी ने दूध का गिलास एक तरफ रखते हुए पूछा- “कल तो छुट्टी है, फिर कपड़े अभी क्यों प्रेस कर रहे हो ?”

“खाली बैठने की आदत नहीं है। अकेला रहता था, तब सारे काम ख़ुद करता था।”

“लेकिन यहाँ तो मैं हूँ न , ये सारे काम करने के लिए।” पत्नी ने अपनी ढोड़ी कंधे पर रखते हुए कहा।

“अकेले बहुत काम किया है तुमने , घर सम्हाला, बच्चा सम्हाला, मेरे माँ-बाप को मुझसे अच्छा रखा । जो खोया है , उसे वापिस नहीं ला सकता , जो बचा है ….उसे तो ज्यादा से ज्यादा समेटकर जी लूँ ।” पति ने कहा ।

“हम्म …तो ये बताओ कि जब तुम यहाँ से जा रहे होते थे, तो मुझे मुड़कर क्यों नहीं देखते थे । मुझे कितना बुरा लगता था ….पता है कुछ ?” पत्नी ने उलाहना सा दिया ।

“हाँ, सब पता है ।”

“तो भी तुम मुँह फेरकर नहीं देखते थे !”

“हाँ, और ये मैं इसलिए करता था ताकि तुम मुझे खडूस समझो, मतलबी और गैर जिम्मेदार समझो ।”

“ऐसा क्यो?”

“अगर ऐसा नहीं करता तो मेरी याद में खीर में चीनी नहीं , नमक डालकर दे देतीं बच्चों को । रोटियाँ जली हुई बनाती, और घर को रगड़ के साफ नहीं करतीं ।” पति ने मुस्कुराते हुए कहा।

“तो क्या मैं इतनी बुरी हूँ ?” पत्नी ने सामने आते हुए पूछा ।

“बहुत बुरी हो ….. इतनी बुरी कि मेरे घर को भी छीन लिया …. और … ।”

“और क्या ?”

“और यही कि कल दूध में चीनी डालना भूल गईं, मुझे तुम्हारी चीनी चुरानी पड़ी … बहुत मीठी हो गई हो तुम । आज ये दूध तुम पी लो।” पति ने कहा।

“हम्म …. तब तो चीनी बिल्कुल बंद …. बचत शुरू ….हा हा हा।” और पत्नी उससे लिपट गई ।

तभी फोन बजा ….प्यार कभी कम न करना सनम ।

“बेटा ! जरा बहू से कहना मुझे गरम पानी दे जाय ।” माँ का फोन था।

“जाओ , माँ को गरम पानी दे आओ …. हा हा हा ।” पति हँसते हुए अलग हुआ।

“वो तो मैं रख आई हूँ , और बाबू जी की दवाई भी ।” पत्नी ने कहा।

“पूनम का चाँद देखने का मन होगा माँ का सोने से पहले …. जल्दी जाओ और बत्ती बुझा दो …. पूनम के चाँद ।” और पति ने उसके चेहरे पर एक चुंबन रख दिया ।

“ये क्या किया , अब मुझे छिपाना पड़ेगा चेहरा ।” पत्नी ने कहा।

“यही तो देखना है माँ को कि तुम सुखी तो हो । पीठ फेरकर जाते हुए उसने भी देखा है । माँ को अपने ही तुम्हारे प्यार की भी चिंता है।”

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