अपना वजूद ढूंढता एक स्ववित्तपोषित शिक्षक डॉ प्रदीप कुमार सिंह

स्ववित्तपोषित शिक्षक लाकडाउन में अपना वजूद ढूंढ रहा है। वह स्वयं को नहीं समझ पा रहा है आखिर वह कौन है। ना पैसा, ना सुरक्षा, ना सरकारी सहायता और ना सामाजिक प्रतिष्ठा। एक प्राइवेट शिक्षक किसी भी हालात में समय से कालेज पहुंच कर विद्यार्थियों के भविष्य को सुधारता है, नेक सकारात्मक विचार व सही रास्ते पर चलना सिखाता है फ़िर भी आज वह लांकडाउन में अपना वजूद ढूंढता ही रह गया है, जोकि इस सराहनीय कार्य को करने के बाद स्वयं पर आता है कि आखिर क्या नहीं किया मैंने। क्या कमी है हममें? सारी योग्यता होते हुए भी हमारे साथ दूर्व्यावहार और जातीयता क्यों? इस कठिन दौर में हमारी किसी ने भी सुध नहीं ली। सब योग्यता होते हुए भी हम ठगा सा महसूस कर रहे हैं। खुद को जलाकर समाज में ज्ञान की मशाल जलाते हैं। विद्यार्थियों के भविष्य को संवारते हैं और हमें खुद अपनी पहचान ढूंढनी पड़ रही है। आज़ के समय में हर शिक्षित व्यक्ति को अपने ऊपर गर्व होता है कि मैंने शिक्षण कार्य को चूना है लेकिन प्राइवेट शिक्षक को लेकर सरकार का कोई ध्यान नहीं है, इनके लिए कोई कार्य योजना नहीं है। लेकिन आज हमारे समाज में शिक्षक की जरूरतो को कितने लोग ध्यान रख पाते हैं। इस लाकडाउन में हम अपनी समस्याओं का बताने को मजबूर हो गए हैं। हम भी सम्मान से जीना चाहते हैं।

