रचनाकार

दो टूक : यह हिन्दुस्तान बचाना है

धीरु भाई ( धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव )

■ वरिष्ठ स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी, पूर्व सांसद श्री गौरीशंकर राय की जयंती ( 10 जून ) की स्मृति को सादर अर्पित कर रहा हूँ , “यह हिन्दुस्तान बचाना है” नज़्म।


यह सच है हमको जाना है, यह सच है तुमको जाना है।
लेकिन इस जाने से पहले, यह हिन्दुस्तान बचाना है।
यह हिन्दुस्तान बचाना है।

उस कातिल से जो अपने को, सबका सुल्तान समझता है।
उस कातिल से जो खुद को ही, अल्ला भगवान समझता है।

उस कातिल से
जिसके कारण,
सौहार्द हमारा टूटा है।
उस कातिल से जो हम सबकी,
रोजी रोटी भी लूटा है।

उस कातिल का हर एक पाप, अब जन जन तक पहुंचाना है।
यह हिन्दुस्तान बचाना है, यह हिन्दुस्तान बचाना है।

जो गंगा यमुना सरयू से, सतलज को गलत बताता है।
जो धरती पुत्र किसानों को,
राहू केतू ठहराता है।

जो धनपशुओं खातिर जीता, धनपशुओं को न्यारा कहता।
मन से दुश्मन है निर्धन का,
पर शब्दों में प्यारा कहता।

इस कातिल का दोहरा चरित्र, इन्सानों को समझाना है।
यह हिन्दुस्तान बचाना है, यह हिन्दुस्तान बचाना है।

घर घर बीमारी की दहशत,
मंहगाई आसमान पे है।
खुद पैदा करता कांटों को, पर दोषारोपण चान पे है।

बस्ती में खाली बर्तन है,
दरिया तट पर हर ओर कफ़न।
बाजारों में सूनापन है,
खेतों बागों में जलन दमन।

इस जलन दमन को रोक यहीं,
फिर अमन का दीप जलाना है।
यह हिन्दुस्तान बचाना है, यह हिन्दुस्तान बचाना है।

जलता है हाथ जला लीजे, नफरत का दीप बुझा दीजे।
पढ़कर रसखान के छंदों को,
इस तुगलक को बतला दीजे।

हम एक बाग के फूल हमें,
गुलदस्ता बनकर रहना है।
इस उपवन खातिर जीना है,
इस उपवन खातिर मरना है।

हर कीमत पर हर हालत में,
हमको यह बाग सजाना है।
यह हिन्दुस्तान बचाना है, यह हिन्दुस्तान बचाना है।

इच्छा है कल अपना परचम, हो हिन्दकुशा वर्मा में भी।
हम खेले खाएं हँसे मिले, तिब्बत में भी, लंका में भी।

कावेरी, ब्रह्मपुत्र का जल,
ले कर ननकाना जाना है।
बंटवारे की दीवारों को, मिलजुल के तोड़ गिराना है।

इस मिट्टी से हम उपजे हैं,
इस मिट्टी में मिल जाना है।
यह हिन्दुस्तान बचाना है, यह हिन्दुस्तान बचाना है।

10 जून 2021

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