हाँ ‘कल्पनाथ’ तुम बहुत याद आते हो
मेरी कलम से…
आनन्द कुमार
सब तेरी राह पर,
चलने की कसमेंं खाते हैं
सब तुझ जैसा
बनने का वादा करते हैं
कुछ जीतते हैं
कुछ हार जाते हैं।
पर जीत कर भी
वह तुझ सा ना बन पाते हैं।
जाते तो उसी चौखट में हैं
जहां तेरी एक पहचान थी।
तेरे दमदार आवाज की,
चंहु ओर आगाज थी।
जो जीत कर गये,
आते हैं शहर को लौटकर
खाली हाथ।
और एक तुम थे,
जब भी लौटे,
मुठ्ठी में विकास लाये।
मऊ को संवारने का सपना,
चाहत हजार लाये।
तुम्हारे बाद, पांच चेहरे गये,
संसद को,
सांसद तो बने सभी
पर कोई “कल्पनाथ” ना बन सका।
आखिर क्यों जो “अतीक” में हैं
वह याद नही आते है।
और तुम “अतीत” होकर भी
बहुत याद आते हो।
हाँ कल्पनाथ तुम
बहुत या आते हो।

