जीवन के दूसरे अध्याय में जीने की सीख देती वृजलाल की बगिया
यशोदा श्रीवास्तव
लखनऊ। यूपी के पूर्व डीजीपी वृजलाल किसी परिचय के मोहताज नहीं।सेवाकाल के दौरान वे अपराधियों के काल के रूप में चर्चित रहे तो इस सेवा के पुलिस अफसरों के वे रोलमाडल भी हैं। अपराध के रास्ते राजनीति में मुकाम हासिल कर बैठे तमाम सारे लोग भी उनसे थर्राते थे। संछिप्त में कहूं तो इनका बस इतना परिचय है कि ये दोस्तों के दोस्त और दुश्मनों के दुश्मन के रूप खासा चर्चित रहे। अभी अभी ये एससी एसटी के चेयरमैन(दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री)पद से मुक्त हुए हैं। इस पद पर रहते हुए भी इन्होंने कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं। एससीएसटी आयोग में गैर दलित को पदासीन करने का मायावती सरकार के अध्यादेश का पर्दाफाश वृजलाल जी ने ही किया।
अब गौर करने की बात यह है कि पुलिस अफसर या फिर किसी आयोग के चेयरमैन के रूप में जो शख्स हर रोज सुर्खियों में रहा हो, उसका हर पल व्यस्तताओं से भरा रहा हो, इस सबसे मुक्त होने के बाद इस शख्स की दिनचर्या अब कैसी है?

यूं तो इस स्तर के सभी लोग अपने जीवन के दूसरे अध्याय में जीना सीख ही लेते हैं लेकिन वृजलाल जैसा जीने का अंदाज शायद ही उनके समकक्ष औरों में दिखे? कहना न होगा कि जीवन के दूसरे अध्याय में भी वे जीवन की अपनी शैली को अपनाने के लिए दूसरों को प्रेरित कर रहें हैं।
उनके जीवन के दूसरे अध्याय की शुरुआत बागवानी से हुई। लखनऊ में गोमतीनगर विस्तार के अपने निजी आवास में उनकी बागवानी आस पड़ोस के लोगों को ललचाती है। उस राह से गुजर रहे लोग बिना ठिठके आगे नहीं बढ़ सकते।कोई उनके उगाए भिन्न भिन्न फूलों के खुशबू में सन जाता तो कोई दर्जनों तरह के आर्कषक सब्जियों को देख मोहित हो जाता।

उनके आवास का आँगन और परिसर तरह – तरह के फूलों , फलों और सब्ज़ियों से हरा भरा रहता है। इनमें कई कई तो इतने दुर्लभ हैं कि जब वे उसका परिचय कराते हैं तब जान मिलता हैं कि यह फला सब्जी या फूल है। कहना न होगा चौराई साग की विभिन्न प्रजातियों के अलावा नितांत ग्रामीण इलाके के ताल पोखरों में पाया जाने वाला महिलाओं की खास पसंद केरमुआ साग भी इनके बगीचे में मौजूद है।
वे कहते हैं कि बाग़वानी उनका खास शौक़ हैं। इससे उन्हें नान पेस्टीसाइड फल और सब्ज़ी मिलती ही है, अच्छा खासा शारीरिक कसरत भी हो जाती है। अपने बोए बीज या पौधों को हरभरा व खिला देखकर जो अनुभूति होती है, उसे शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं है।

अपने बगीचे के कुछ खास फूल और सब्जियों का परिचय कराते हुए उन्होंने ब्रह्मकमल के बारे में बताया। कहा यह साल में कभी भी खिल सकता है। अक्टूबर 2019 के नवरात्रि में एक साथ 9 फूल खिले थे। शाम को फूल खुलना शुरू होता है, और रात्रि 10 बजे तक पूरा खिल जाता है और सुबह सूरज की किरण के साथ मुरझा जाता है । यह केवल एक रात का फूल है।पहाड़ों पर एक किस्म का और ब्रह्म कमल खिलता है , जो उत्तराखंड का राज्यपुष्प है।
इसी तरह पीसलिली के बारे में बताया।कहा हमेशा हराभरा रहनेवाला यह पौधा मूलरूप से दक्षिण अमेरिका के वर्षा वनों में पाया जाता है , जिसका वैज्ञानिक नाम स्पैथीफेलियम है।इस पौधे को छाया पसंद है , यह सीधे सूर्य की रोशनी बर्दाश्त नहीं कर पाता है। अच्छा इंडोर प्लांट है । इसे प्रसिद्धि तब मिली जब नासा ने इसे टाप टेन हाउसहोल्ड एयर क्लीनिंग प्लांट के रूप में मान्यता दी। मै नर्सरी से इसके ख़ूबसूरत पत्तों को देखकर लाया था। अब जब फूल खिले , तब जानकारी हुई कि यह पीसलिली है।
अपने बगीचे का एक दुर्लभ फल दिखाते हुए उन्होंने कहा कि यह कहना बेमानी है कि लखनऊ में आड़ू नहीं हो सकता। मेरठ में आडू बहुत होता है , मै 1991-93 में मेरठ का एसएसपी रहा। मैंने सोचा कि मेरठ और लखनऊ के वातावरण में काफ़ी समानता है। मैंने शाहजहाँपुर मेरठ की राजधानी नर्सरी से पौधे यहाँ और अपने गाँव सिद्धार्थनगर में लगवाये और परिणाम सामने है।पहलीबार मात्र 15-20 ही फल आये परंतु अगले वर्ष से अधिक फल की उम्मीद है। उन्होंने गोल लौकी के बारे में जानकारी दी।कहा कि इसे मै तीन साल से लगा रहा हूँ।यह इतना सॉफ़्ट है कि मुँह में जाते ही गल जाता है और उतना ही स्वादिष्ट भी है। कई लौकियाँ पकाने के बाद भी कड़ी रह जाती है , परंतु इसे यदि पकाते समय ध्यान नहीं दिया तो गलकर हलुवा बन जायेंगी।
बगीचे में लगे बारहमासी सहजन के बारे में बताया कि नाम के अनुसार यह हर समय फल देता है।सीजनल सहजन केवल मार्च- अप्रैल में ही मिलता है। इसकी फली, फूल , पत्ती सब में औषधीय गुण है। उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले वर्ष पूरे प्रदेश में अभियान चलाकर सहजन का वृक्षारोपण करवाया था। सहजन पूरे देश में खाया जाता है। साम्भर बिना सहजन के अधूरा है।इसी तरह अपने बगीचे में लगे कई किस्म के केले व अन्य दर्जन भर दुर्लभ प्रजाति के फल और फूलों की जानकारी देते हुए बताया कि इस घनघोर हरियाली के बीच मन खुशियों से झूम उठता है जब हमारे बगिया में गौरैया कि चहचहाहट सुनाई पड़ती है।उन्होंने साफ कहा कि व्यक्ति यदि किसी ऊंचे व रसूखदार ओहदे से मुक्त होता है तो उसके जीवन का दूसरा अध्याय बड़ा दुष्कर होता है, ऐसे में प्राकृत की छाया ही उसे आनंद मयी बनाती है।हवाओं के झोकों से उसका शीतल स्पर्श व्यक्ति को ऊर्जावान बनाती है और मानव सभ्यता के विकास में कुछ न कुछ नया करते रहने को प्रेरित करती है।


