तो क्या हम सुधरेंगे और जग सुधरेगा
अखबार का कोना : दैनिक भास्कर (प्रवीण राय) उपसंपादक दैनिक भास्कर-वाराणसी
आज जहां एक ओर कोरोना वायरस ने समूचे विश्व की इंसानियत को खतरे में डाल दिया है। वहीं लाकडाउन ने न सिर्फ प्रकृति के शोधन का काम किया है। वरन इंसान को इंसानियत सिखा दिया है। लोगों को जीवन जीने का ढंग बता दिया है। चकाचौंध की दुनिया में सड़कों पर शोर-शराबा सिटी मॉल में भीड़-भगदड़ बाजारों में अफरा-तफरी ने आदमी को मशीन बना दिया था। न खाने का समय न सोने का समय। कहीं पिज़्ज़ा- बर्गर, कहीं पानी-पुरी, और गोलगप्पे आदि जहर रूपी खाद्य पदार्थों का शरीर में जाना एवं जीवन की आपाधापी से शुगर, ब्लड प्रेशर, हार्ट अटैक, किडनी, लीवर, आदि घातक बीमारियों की चपेट में आने के कारण अस्पतालों की इमरजेंसी में भी लाइन लगती थी। लेकिन आज सब कुछ शांत हो गया है। जैसे किसी के मरने पर उसकी मय्यत में शरीक होने के बाद कुछ क्षण के लिए ऐसा लगता है कि जीवन में कुछ है ही नहीं, एक दिन सब कुछ इसी प्रकार छोड़कर चले जाना है। फिर क्यों चोरी, बेईमानी, आपाधापी किया जाए। लेकिन यह एहसास क्षणिक होता है और अगले ही कुछ पल बाद हम अपनी पुरानी गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं।

आज सब लोग अपने-अपने परिवार में आनंद पूर्वक हैं। क्या अमीर क्या गरीब सब का उद्देश्य सिर्फ पेट भरने तक रह गया है। और वह भी घर का शुद्ध भोजन। यही कारण है कि अस्पतालों में मरीजों की संख्या भी कम दिखाई दे रही है। सबके चेहरे पर संतोष का भाव दिख रहा है।और दिखे भी क्यों नहीं? क्योंकि सब लोग उसी अवस्था में पड़े हैं। यदि किसी एक के साथ ऐसा रहता तो प्रतिद्वंद्विता करनी पड़ती, आज सब लोग एक समान दिख रहे हैं। प्रकृति के एक प्रहार ने मनुष्य को सोचने पर मजबूर कर दिया है।फैक्ट्रियों के बंद होने से नदियों में बहने वाले कचरे पर लगाम लगी है, जिससे गंगा, यमुना आदि नदियों का पानी स्वच्छ हुआ है। मोटर, गाड़ी बंद होने के कारण दिल्ली, मुंबई जैसी अधिक प्रदूषित शहरों का वातावरण शुद्ध हुआ है। प्रदूषण के कारण हमेशा धुंध सा दिखने वाले दिल्ली के आसमान में तारे दिखाई देने लगे हैं। वर्षों बाद प्रदूषण की कमी के कारण जालंधर से हिमालय पर्वत की चोटी साफ दिखाई देने लगी है। चों-चों, पों-पों की शोरगुल के बीच पशु-पक्षियों की आवाज को दबा दिया था। आज उनके कलरव सुनाई देने लगे हैं आज ऐसा प्रतीत होता है जैसे हम अपनी झूठी शान के लिए अपने जीवन तथा प्रकृति से खिलवाड़ कर रहे थे। अपने को संसाधन संपन्न बनाने के लिए अपना घर-बार छोड़कर उस चकाचौंध की दुनिया से जब हमें वापस अपने घर को लौटना हुआ, तो एक अजीब सा सुकून महसूस हो रहा है। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि क्या यह सुकून हमारे विकास में बाधक होगा? इसके जवाब के लिए सरकार अभी से सतर्क दिख रही है, और इसीलिए ग्रामोद्योग, ग्राम स्वरोजगार, योजना स्किल डेवलपमेंट आदि योजनाओं पर सरकार तेजी से अपने कदम उठा रहे हैं। सरकार का उद्देश्य है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराकर, शहरी पलायन को रोका जाए। इसके साथ ही भारत कृषि प्रधान देश है,और कहा जाता है कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है। यही कारण है कि लाक डाउन की स्थिति में जहां सारे कल-कारखाने बंद होने के बावजूद भी इतनी बड़ी आबादी वाले भारत देश में अन्न की कमी नहीं है। और यही सरकार एवं देश के लिए सबसे सकून की बात है। शायद इसीलिए आज न सिर्फ सरकार बल्कि सरकारी तंत्र और व्यवसाई वर्ग को भी कृषि की उपयोगिता समझ में आ रही है। लेकिन इस महामारी से छुटकारा पाने के बाद क्या हमारा पुनः मोहभंग हो जाएगा? क्या हम फिर उसी चकाचौंध की दुनिया में फंसकर प्रकृति को अपने अरमानों तले रौंदेंगे? क्या अन्नदाता किसान फिर बेबस लाचार मजबूर दिखाई देगा? या फिर हम सुधरेंगे और जग सुधरेगा।

